Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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हा! एटलुं छे केमंत्रादिकनी अचिंत्यशक्ति छे. त्यां कोई साचा मंत्रने निमित्त
नैमित्तिक संबंध थाय, तो तेनाथी किंचित् गमनादि थई शके नहि, वा किंचित् दुःख ऊपजे
छे, वा कोई प्रबळ तेने मनाई करे तो ते अटकी जाय. वा पोतानी मेळे पण अटकी जाय.
इत्यादि मंत्रनी शक्ति छे. परंतु सळगाववुं आदि थतुं नथी; मंत्रवाळो ज सळगाव्युं कहे छे.
ते फरी प्रगट थई जाय छे कारण के
वैक्रियिक शरीरने सळगाववुं आदि संभवतुं नथी.
वळी व्यंतरोने अवधिज्ञान कोईने अल्पक्षेत्र-काळ जाणवानुं छे, तथा कोईने घणुं छे,
त्यां तेने जो ईच्छा होय, अने घणुं ज्ञान होय, तो कोई अप्रत्यक्षने पूछतां तेनो उत्तर आपे,
वा पोताने अल्पज्ञान होय, तो कोई अन्य महत्ज्ञानीने पूछी आवी जवाब आपे. वळी जो
पोताने अल्पज्ञान होय, अने ईच्छा न होय, तो पूछवा छतां पण तेनो उत्तर न आपे, एम
समजवुं. वळी अल्पज्ञानवाळा व्यंतरादिकने ऊपज्या पछी केटलोक काळ ज पूर्वजन्मनुं ज्ञान
होई शके छे, पछी तेनुं स्मरणमात्र ज रहे छे. तेथी त्यां कोई इच्छावडे पोते कांई चेष्टा
करे तो करे, पूर्वजन्मनी वात कहे, पण कोई अन्य वात पूछे, तो तेने अवधिज्ञान थोडुं होवाथी
जाण्या विना केवी रीते कहे? वळी तेनो उत्तर पोते आपी शके नहि, वा इच्छा न होय,
अथवा मान
कुतूहलादिथी उत्तर न आपे वा जूठ पण बोले; एम समजवुं.
देवोमां एवी शक्ति छे केतेओ पोताना वा अन्यना शरीरने वा पुद्गलस्कंधोने
पोतानी इच्छानुसार परिणमावे छे, तेथी नानाप्रकारना आकारादिरूप पोते थाय. नाना प्रकारनां
चरित्र बतावे, वा अन्य जीवना शरीरने रोगादियुक्त करे.
अहीं एटलुं समजवुं केपोताना शरीरनो, अन्य पुद्गलस्कंधोने, पोतानी जेटली
शक्ति होय तेटला प्रमाणमां ज तेओ परिणमावी शके छे, कारण केतेमनामां सर्व कार्य
करवानी शक्ति नथी. वळी अन्य जीवोना शरीरादिकने तेना पुण्यपापानुसार परिणमावी शके
छे. जो तेने पुण्यनो उदय होय, तो पोते रोगादिरूप परिणमावी शके नहि, तथा पापनो उदय
होय तो तेनुं इष्टकार्य पण करी शके नहि.
ए प्रमाणे व्यंतरादिकनी शक्ति जाणवी.
प्रश्नःएटली जेनी शक्ति होय, तेने मानवापूजवामां शो दोष?
उत्तरःपोताने पापनो उदय जो होय तो तेओ सुख आपी शके नहि, तथा पुण्यनो
उदय होय तो दुःख आपी शके नहि. वळी तेमने पूजवाथी कांई पुण्यबंध थतो नथी, पण
रागादिवृद्धि थई ऊलटो पापबंध ज थाय छे, तेथी तेमने मानवा
पूजवा कार्यकारी नथी, पण
बूरुं करवावाळा छे. व्यंतरादिक मनावेपूजावे छे, ते तो कुतूहलादिक ज करे छे, पण कांई विशेष
प्रयोजन राखतां नथी. जे तेमने मानेपूजे तेनाथी कुतूहल कर्या करे, तथा जे न मानेपूजे तेने
कांई कहे नहि. जो तेमने प्रयोजन ज होय. तो न मानवापूजवावाळाने तेओ घणा दुःखी करे,
छठ्ठो अधिकारः कुदेव-कुगुरु-कुधर्म-निराकरण ][ १७१