कोई चमत्कार थाय छे ते तेमना अनुचर व्यंतरादिको द्वारा कर्यो होय छे.
वळी अन्यमतमां – ‘‘भक्तोने परमेश्वरे सहाय करी, वा प्रत्यक्ष दर्शन आप्यां,’’
इत्यादिक कहे छे. त्यां कोई तो कल्पित वातो कहे छे, तथा कोई तेमना अनुचर – व्यंतरादिक
द्वारा करेलां कार्योने परमेश्वरे कर्यां कहे छे. हवे जो परमेश्वरे कर्यां होय तो परमेश्वर तो
त्रिकालज्ञानी छे, सर्व प्रकारे समर्थ छे, तो भक्तोने दुःख ज शामाटे थवा दे? परंतु आजे
पण जोईए छीए के – म्लेच्छ आवीने भक्तोने उपद्रव करे छे, धर्म विध्वंस करे छे, धर्मकार्यमां
उपद्रव करे छे, तथा मूर्तिने विघ्न करे छे. हवे परमेश्वरने जो ए कार्योनुं ज्ञान न होय,
तो तेनामां सर्वज्ञपणुं रहे नहि, तथा जाण्या पछी जो ते सहाय न करे तो तेनी भक्तवत्सलता
गई, वा ते सामर्थ्यहीन थयो. वळी जो ते साक्षीभूत रहे छे, तो आगळ भक्तोने सहाय
करी कहो छो, ते जूठ छे; कारण – तेनी तो एकसमान वृत्ति छे.
वळी जो कहेशो के — ‘‘एवी भक्ति नथी.’’ पण म्लेच्छोथी तो आ भला छे! वा
मूर्ति आदि तो तेमनी ज स्थापित हती, तेने तो विघ्न न थवा देवुं हतुं? वळी म्लेच्छ –
पापीओनो उदय थाय छे, ते परमेश्वरनो कर्यो थाय छे के नहि! जो परमेश्वरनो कर्यो थाय
छे, तो तेओ निंदकोने सुखी करे छे तथा भक्तोने दुःख देवावाळाओने पेदा करे छे, तो त्यां
भक्तवत्सलपणुं केवी रीते रह्युं? तथा जो परमेश्वरनो कर्यो नथी थतो, तो ए परमेश्वर
सामर्थ्यहीन थयो; माटे ए परमेश्वरकृत कार्य नथी, पण कोई अनुचर – व्यंतरादिक ज ए
चमत्कारो बतावे छे; एवो ज निश्चय करवो.
प्रश्नः — ‘‘कोई व्यंतर पोतानुं प्रभुत्व कहे छे, अप्रत्यक्षने बतावे छे, कोई
कुस्थाननिवासादि बतावी पोतानी हीनता कहे छे, पूछवा छतां बतावता नथी, भ्रमरूप
वचन कहे छे, अन्यने अन्यथा परिणमावे छे, तथा अन्यने दुःख आपे छे, इत्यादि
विचित्रता केवी रीते छे?’’
उत्तरः — व्यंतरोमां प्रभुत्वनी अधिकता – हीनता तो छे, परंतु कुस्थानमां निवासादिक
बतावी हीनता देखाडे छे, ते तो कुतूहलथी वचन कहे छे. व्यंतर बाळकनी माफक कुतूहल
कर्या करे छे, जेम बाळक कुतूहलथी पोताने हीन दर्शावे, चिडावे, गाळ सांभळे, राड पाडे,
तथा पाछळथी हसवा लागी जाय, तेम व्यंतर पण चेष्टा करे छे. जो तेओ कुस्थानवासी
होय, तो उत्तमस्थानमां आवे छे ते कोना लाव्या आवे छे? जो पोतानी मेळे ज आवे छे,
तो पोतानी शक्ति होवा छतां तेओ कुस्थानमां शामाटे रहे छे? माटे तेमनुं ठेकाणुं तो तेओ
ज्यां ऊपजे छे त्यां आ पृथ्वीना नीचे वा उपर छे अने ते मनोज्ञ छे, पण कुतूहल अर्थे
तेओ इच्छानुसार कहे छे. वळी जो तेमने पीडा थती होय, तो रोता रोता केवी रीते हसवा
लागी जाय?
१७० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
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