नथी, तथा लज्जा छूटी नथी, तो पाघडी अने अंगरखादि प्रवृत्तिरूप वस्त्रादिकनो शामाटे त्याग
कर्यो? तथा एने छोडी आवा स्वांग बनाववामां कयुं धर्मनुं अंग थयुं? पण मात्र गृहस्थोने
ठगवा माटे ज एवा वेषो छे, एम जाणवुं. कारण के – जो तेओ गृहस्थ जेवो पोतानो स्वांग
राखे, तो गृहस्थ केवी रीते ठगाय? पण तेमने आवा वेष द्वारा आ गृहस्थो पासेथी
आजीविका, धनादिक तथा मानादिक प्रयोजन साधवुं छे. तेथी तेओ एवा स्वांग बनावे छे,
अने भोळुं जगत ए स्वांगने जोई ठगाय छे, धर्म थयो माने छे. पण ए भ्रम छे,
‘उपदेशसिद्धांतरत्न’मां कह्युं छे के —
जह कुवि वेस्सारत्तो मुसिज्जमाणो विमण्णए हरिसं,
तह मिच्छवेसमुसिया गयं पि ण मुणंति धम्म-णिहिं ।।५।।
(उपदेशसिद्धान्तरत्नमाळा)
अर्थः — जेम कोई वेश्यासक्त पुरुष धनादि ठगावतो होवा छतां पण हर्ष माने छे,
तेम मिथ्यावेषवडे ठगाता जीवो, नाश पामता धर्मधनने जाणता नथी. भावार्थ — ए
मिथ्यावेषवाळा जीवोनी सुश्रुषादिथी पोतानुं धर्मधन नाश थाय छे, तेनो तो तेमने खेद नथी,
पण ऊलटा मिथ्याबुद्धिथी हर्ष करे छे.
त्यां कोई तो — मिथ्याशास्त्रोमां निरूपण करेला वेषने धारण करे छे; ए शास्त्रोना
रचवावाळा पापाशयीओए सुगमक्रियाथी, उच्चपदप्राप्तिना प्ररूपणथी ‘‘अमारी मान्यता थशे, वा
अन्य घणा जीवो आ मार्गमां जोडाशे,’’ एवा अभिप्रायथी मिथ्या उपदेश आप्यो. अने तेनी
परंपरावडे विचाररहित जीवो, एटलो पण विचार करता नथी के – सुगमक्रियाथी उच्चपदप्राप्ति
बतावे छे, त्यां कंईक दगो छे! पण मात्र भ्रमपूर्वक तेमना कहेला मार्गमां तेओ प्रवर्ते छे.
वळी कोई – शास्त्रोमां निरूपण करेला कठण मार्ग तो पोतानाथी सधाय नहि, अने पोतानुं
उच्चनाम धराया विना लोक माने पण नहि, ए अभिप्रायथी यति, मुनि, आचार्य, उपाध्याय,
साधु, भट्टारक, संन्यासी, योगी, तपस्वी अने नग्न इत्यादि नाम तो उच्च धरावे छे, पण
तेवा आचरणोने साधी शकता नथी, तेथी इच्छानुसार नाना प्रकारना वेष बनावे छे, तथा
केटलाक तो पोतानी इच्छानुसार ज नवीन नाम धारण करे छे अने इच्छानुसार वेष बनावे
छे. अने एवा अनेक वेष धारवाथी पोतानामां गुरुपणुं माने छे, पण ए मिथ्या छे.
प्रश्नः — वेष तो घणा प्रकारना देखाय छे, तो तेमां साचा{जूठा वेषनी
पिछाण केवी रीते थाय?
उत्तरः — जे वेषमां विषय – कषायनो कांई पण लगाव नथी, ते वेष साचो छे. ए
साचो वेष त्रण प्रकारनो छे, बाकीना सर्ववेष मिथ्या छे.
छठ्ठो अधिकारः कुदेव-कुगुरु-कुधर्म-निराकरण ][ १७७