अने कर्यो – कराव्यो – अनुमोद्यो आहार लेवो, इत्यादि क्रियानो निषेध कर्यो छे. पण आजे
काळदोषथी ए ज दोषो लगावी आहारादि ग्रहण करे छे.
१२. निषिद्धदोष – कोईए मना करेली वस्तु पण मुनिने आपवामां आवे, तो ते
निषिद्धदोषसहित आहार छे. तेना बे भेद छे. १. मालिकनी निषेध करेली तथा बीजी पोते ते वस्तुनो
मालिक तो नथी, पण पोताने ते मालिक समजे छे, तेवाए निषेध करेली.
१३. अभिˆतदोष – एक सरलपंक्तिमां आवेल त्रण अथवा सात मकानो छोडीने बाकी
सर्वजग्याएथी मुनिना भोजन माटे लावेली अयोग्य अन्नादि भोजनसामग्रीने अभिह्नतदोषसहित भोजन
कहे छे.
१४. उद्दभिन्नदोष – एवी कोई पण घी, खांड, गोळ आदि वस्तु के जे कर्दम व लाख आदिथी
ढांकेली होय. अथवा कोई प्रकारनी नामनी सील – महोर करेली होय तेवी वस्तु खोलीने साधुने आपवामां
आवे, तो ते उद्दभिन्नदोषसहित छे.
१५. आछेद्यदोष – राजा वा मंत्री आदिना भयथी साधुने गृहस्थ जे आहार आपे, ते
आछेद्यदोषसहित छे.
१६. मालारोहणदोष – नीसरणी – दादर आदि उपर चढी, माळ परथी भोजन लावी साधुने
आपवामां आवे, ते मालारोहणदोषसहित आहार छे. एम करतां दातारने हरकत, मुश्केली थाय छे, तेथी
ते पण सदोषआहार छे.
हवे मुनि आश्रये सोळ प्रकारना उत्पादन दोष कहे छेः —
१. धाात्रीदोष – धात्री पांच प्रकारनी छेः मार्जन, खेलन, स्वापन, मंडन अने क्षीर. एमांथी
एक या अनेक कार्योनो संयमी साधु प्रयोग करे, जेथी अनुरागी थई गृहस्थ भोजन आपे, तेने संयमी
ग्रहण करे, ते धात्रीदोषसहित भोजन छे. आ पांच प्रकारनुं धात्रीकर्म संयमी पोते करे, करावे वा उपदेशे,
तेथी मेळवेलुं भोजन पण सदोष छे.
२. दूतदोष – संबंधीओनां वचनो, वृत्तान्तो, संदेशाओ स्थानांतरे पहोंचाडी, दातारने संतुष्ट –
अनुरागी करी, ते द्वारा निपजावेला भोजनने दूतदोषसहित भोजन कहे छे.
३. निमित्तदोष – अष्टांगनिमित्त (लांच्छन, अंग, स्वर, छेद, भौम, अंतरिक्ष, लक्षण तथा स्वप्न)
द्वारा गृहस्थने संतुष्ट करी भोजन करे, ते निमित्तदोषसहित भोजन छे.
४. वनिपकवचनदोष – दातारना अनुकूलवचन बोली आहारादि ग्रहण करे, ते वनिपकवचन
दोषसहित भोजन छे. एमां साधुनी दीनता ज थाय छे. पोतानी सत्य समज विरुद्ध बोलाय छे, ते ज
दीनता.
५. आजीवदोष – हस्तरेखा, शिल्पशास्त्रादिज्ञान वा (पोतानां) कुळ, जाति, ऐश्वर्य, तप, अनुष्ठान
आदि प्रगट करी भोजन ग्रहण करवुं. ते आजीवदोषसहित भोजन छे.
६. क्रोधादोष – क्रोधित थई भोजनादि ग्रहण करवुं, ते क्रुद्धदोषसहित भोजन छे.
७. मानदोष – अभिमानवश थई भोजन लेवुं, ते मानदोषसहित भोजन छे.
छठ्ठो अधिकारः कुदेव-कुगुरु-कुधर्म-निराकरण ][ १८५