गृहस्थोना बाळकोने प्रसन्न करवा, समाचार कहेवा, मंत्र – औषधि – ज्योतिषादिकार्य बताववां,
भेद छे — १. सर्व साधारणना उद्देशथी करेलो आहार, २. पाखंडीओना उद्देशथी करेलो आहार.
३. पार्श्वस्थना उद्देशथी करेलो आहार तथा ४ साधुओना उद्देशथी करेलो आहार.
२. साधिाकदोष – दातार पोताना माटे पाकता भात, दाळ, जळ, इंधनमां, मुनिओने दान
देवाना अभिप्रायथी ‘‘आज तो हुं मुनिने आहार आपीश’’ एवो संकल्प करी तेमां बीजा नवा चोखा,
दाळ, पानी, इंधन वगेरे उमेरे, ते साधिकदोष आहार छे.
३. पूतिदोष – प्रासुकवस्तुमां अप्रासुकवस्तु मेळवी दे, ते पूतिदोष छे. अथवा आ पात्रमांनुं
वा आ पात्रमांनुं बनावेलुं अन्न ज्यां सुधी मुनिने न आपवामां आवे, त्यां सुधी तेनो कोईए उपयोग
करवो नहि, एवो संकल्प करवो. ते पण पूतिदोषसहित आहार छे. पहेलाने अप्रासुकमिश्रदोष तथा
बीजाने पूतिकर्मकल्पनादोष कहे छे.
४. मिश्रदोष – पाखंडीओ तथा गृहस्थोनी साथे साथे मुनिओने आपवा माटे बनावेला
अचित्तभोजनने, मिश्रदोषसहित भोजन कहे छे.
५. प्राभृतदोष – जे काळमां जे वस्तु आपवा योग्य छे, ते ते काळमां नहि आपतां अन्य
काळमां आपे, ते प्राभृत दोष छे. तेना बे भेद छे. १. स्थूलप्राभृत, २. सूक्ष्मप्राभृत.
६. बलिदोष – यक्ष, नाग, माता, कुळदेवी तथा पित्रादिक माटे बनावेला भोजनमांथी संयमी
साधुओने जे भोजन आपवामां आवे, ते बलिदोषसहित भोजन छे.
७. न्यस्तदोष – एक वासणमांथी बीजा वासणमां फेरवी, पोताना घरमां वा बीजाना घरमां
राखी मूकेलुं भोजन होय, ते न्यस्तदोषसहित भोजन छे. ते एटला माटे दोषित छे के – कोई अन्य
मनुष्य साधुने भोजन दे, तो तेमां गरबड वा भूलथाप थवा संभव छे.
८. प्रादुष्कारदोष – तेना बे भेद छे. १. संक्रम, २. प्रकाश. साधुना आव्या पछी भोजनना
वासण आदिने एक जग्याएथी बीजी जग्याए लई जवां, ते संक्रमपादुष्कारदोष छे, तथा साधुना आव्या
पछी कमाडमंडपादि दूर करवां, भस्मजलादिथी वासण मांजवां, दीवोदेवता सळगाववो, ते प्रकाशप्रादुष्कार
दोष छे.
९. क्रीतदोष – भिक्षा अर्थे साधु घरमां आव्या पछी तेमने माटे बदलामां अन्य सामग्री आपी
भोजन सामग्री लाववी, ते क्रीतदोष छे, तथा गाय, धन, विद्या आदि आपी भोजन सामग्री लाववी,
ते पण क्रीतदोषसहित आहार छे.
१०. प्रामित्यदोष – मुनिदान माटे उधार लावेला अन्नने प्रामित्यदोषसहित आहार कहे छे.
जेथी अंते दातारने क्लेश परिश्रम उठाववो पडे छे. कदर्थित थवुं पडे छे. ते द्रव्यभोजनना बे भेद
छे – १ व्याजवुं, २ उछीनुं.
११. परिवर्तितदोष – एक चीजने बदलामां आपीने बीजी चीज दान अर्थे लाववामां आवे,
तेवी भोजनसामग्री परिवर्तित दोषसहित छे. कारण तेथी पण दातारने संक्लेश, परिश्रम अने संकोच थाय
छे.
१८४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक