Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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श्री योगेन्द्रदेवकृत परमात्मप्रकाशमां कह्युं छे के
चेल्ला-चेल्ली पुत्थियहिं तूसइ मूढु णिभंतु
एयहिं लज्जइ णाणियउ बंधहं हेउ मुणंतु ।।२१५।।
अर्थःचेलाचेली अने पुस्तको वडे तो मूढ संतुष्ट थाय छे, पण भ्रांतिरहित एवो
ज्ञानी, तेने बंधनुं कारण जाणी, तेनाथी लज्जायमान थाय छे.
केण वि अप्पउ वंचियउ सिरु लुंचिवि छारेण
सयल वि संग ण परिहरिय जिणवर लिंगधरेण ।।२१७।।
अर्थःजे जीव वडे पोतानो आत्मा ठगायो, ते जीव क्यो? के जे जीवे जिनवरनुं
लिंग धार्युं, राखवडे माथानो लोच कर्यो, पण समस्त परिग्रह छोड्यो नहि.
जे जिण-लिंगु धरेवि मुणि इट्ठ परिग्गह लेंति
छद्दि करेविणु ते जि जिय सा पुणु छद्दि गिलंति ।।२१८।।
अर्थःहे जीव! जे मुनिलिंगधारी इष्टपरिग्रहने ग्रहण करे छे, ते ऊलटी करीने
ते ज ऊलटीने पाछो भक्षण करे छे, अर्थात् ते निंदनीय छे; इत्यादि त्यां कह्युं छे.
ए प्रमाणे शास्त्रोमां पण कुगुरु, तेनां आचरण, अने तेनी सुश्रुषानो निषेध कर्यो छे,
ते जाणवो.
वळी ज्यां मुनिने धात्री दूत आदि छेतालीस दोष* आहारादिमां कह्यां छे, त्यां
१.गृहस्थो मोक्षमार्गस्थो, निर्मोहो नैव मोहवान्
अनगारो गृही श्रेयान् निर्मोहो मोहिनो मुनेः ।।
अर्थःदर्शनमोहविनानो गृहस्थ तो मोक्षमार्गमां छे, पण मोहवान एवो अणगार अर्थात्
गृहरहित मुनि मोक्षमार्गी नथी, तेथी मोहीमुनि करतां दर्शनमोहरहित गृहस्थ सर्वोत्कृष्ट छे. भावार्थ
जेने मोह अर्थात् मिथ्यात्व नथी, एवो अव्रतसम्यग्द्रष्टि मोक्षमार्गी छे. कारण केसात आठ भव
देवमनुष्यना ग्रहण थई नियमथी ते मोक्षे जशे, पण मुनिव्रतधारी मिथ्याद्रष्टि साधु थयो छे, तोपण
मरीने भवनत्रयादिकमां ऊपजी संसारमां ज परिभ्रमण करशे. (श्रीरत्नकरण्डश्रावकाचार)
संग्राहकअनुवादक.
* ए छेंतालीस दोष आ प्रमाणे छेः
दातारआश्रयी सोळ प्रकारना उद्गम दोषनुं वर्णनः
१. औदेशिकदोषअठ्ठावीस मूलगुणोने धारवावाळा निर्ग्रंथने साधु कहे छे. तेमना निमित्तथी
जे आहार बनाववामां आवे, ते औदेशिकदोषवाळो आहार छे. ए औदेशिकदोषसहित आहारना चार
छठ्ठो अधिकारः कुदेव-कुगुरु-कुधर्म-निराकरण ][ १८३