Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 172 of 370
PDF/HTML Page 200 of 398

 

background image
हवे नग्न थतां तो भांडनुं द्रष्टांत संभवे छे, पण परिग्रह राखे तो ए द्रष्टांत पण बने नहि.
कह्युं छे के
जे पावमोहियमई लिंगं घेत्तूण जिणवरिंदाणं
पावं कुणंति पावा ते चत्ता मोक्खमग्गम्मि ।।७८।। (मोक्षपाहुड)
अर्थःपापवडे मोहित थई छे बुद्धि जेनी, एवा जे जीवो जिनवरनुं लिंग धारी
पाप करे छे, ते पापमूर्ति मोक्षमार्गमां भ्रष्ट जाणवा.
वळी कह्युं छे के
जे पंचचेलसत्ता गंथग्गाहींय जायणासीला
आधाकम्मम्मि रया ते चत्ता मोक्खमग्गम्मि ।।७९।। (मोक्षपाहुड)
अर्थःजे पांचप्रकारना वस्त्रोमां आसक्त छे, परिग्रहने ग्रहण करवावाळा छे,
याचना सहित छे, तथा आधाकर्मादि दोषोमां लीन छे, ते मोक्षमार्गमां भ्रष्ट जाणवा.
बीजी पण गाथा त्यां ते श्रद्धानने द्रढ करवा माटे कहेल छे ते त्यांथी जाणवुं.
श्री कुंदकुंदाचार्यकृत लिंगपाहुडमां, जेओ मुनिलिंगधारी हिंसा, आरंभ, यंत्र
मंत्रादि करे
छे, तेनो घणो निषेध कर्यो छे.
श्रीगुणभद्राचार्यकृत आत्मानुशासनमां पण कह्युं छे के
इतस्ततश्च त्रस्यन्तो विभावर्य्यां यथा मृगाः
वनाब्दिषन्त्युपग्रामं कलौ कष्ट तपस्विनः ।।१९७।।
अर्थःजेम रात्रि विषे मृग ज्यां त्यांथी भयवान बनी वनमांथी नगरनी समीप
आवीने वसे छे, तेम आ कळिकाळमां तपस्वी पण मृगनी माफक ज्यां त्यांथी भयभीत
बनी, वनमांथी नगरनी समीप आवी वसे छे, ए महाखेदकारक कार्य छे. अहीं नगर-
समीप ज रहेवुं निषेध्युं तो नगरमां रहेवुं तो स्वयं निषेध थयुं. वळी ए ज ग्रंथमां कह्युं
छे के
वरं गार्हस्थ्यमेवाद्य तपसो भावि जन्मनः
सुस्त्रीकटाक्षलुण्टाकैर्लुप्तवैराग्यसंपदः ।।१९८।।
अर्थःजेनाथी अनंतसंसार थवा योग्य छे, एवा तप करतां तो गृहस्थपणुं ज
भलुं छे, केवुं छे ए तप? प्रभात थतां ज स्त्रीओना कटाक्षरूप लुंटाराओवडे जेनी वैराग्यसंपदा
लुंटाई गई छे.
१८२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक