छे अने कुगुरुना श्रद्धान सहित छे, ते सम्यग्द्रष्टि क्यांथी होय? तथा सम्यक्त्व विना अन्य
धर्म पण न होय, तो ते धर्म विना वंदन योग्य क्यांथी होय?
जे दंसणेसु भट्ठाः णाणे भट्ठा चरित्तभट्ठा य ।
एदे भट्ठ वि भट्ठा सेस पि जणं विणासंति ।।८।। (दर्शनपाहुड)
अर्थः — जे श्रद्धानमां, भ्रष्ट छे, ज्ञानमां भ्रष्ट छे, तथा चारित्रमां भ्रष्ट छे. ते जीव
भ्रष्टमां पण भ्रष्ट छे, अन्य जीवो के जेओ तेनो उपदेश माने छे, ते जीवोनो पण ते नाश
करे छे – बूरुं करे छे.
वळी कहे छे के
—
जे दंसणेसु भट्ठा पाए पाडंति दंसणधराणं ।
ते होंति लल्लमूआ बोही पुण दुल्लहा तेसिं ।।१२।। (दर्शनपाहुड)
अर्थः — जे पोते तो सम्यक्त्वथी भ्रष्ट छे. छतां सम्यक्त्वधारकोने पोताना पगे
पडाववा इच्छे छे, ते लूला, गूंगा, वा स्थावर थई जाय छे, तथा तेने बोधिनी प्राप्ति
महादुर्लभ थई जाय छे.
जे वी पडंति च तेसिं जाणंता लज्जागारवभयेण ।
तेसिं पि णत्थि बोही पावं अणुमोचमाणाणं ।।१३।। (दर्शनपाहुड)
अर्थः — जे जाणतो होवा छतां पण, लज्जा, गारव अने भयथी तेना पगे पडे
छे, तेने पण बोधि अर्थात् सम्यक्त्व नथी. केवा छे ए जीवो? मात्र पापनी अनुमोदना करे
छे. पापीओनुं सन्मानादिक करतां पण ते पापनी अनुमोदनानुं फळ लागे छे.
वळी कहे छे के —
जस्स परिग्गहगहणं अप्पं बहुयं च हवइ लिंगस्स ।
सो गरहिउ जिणवयणे परिगहरहिओ णिरायारो ।।१९।। (सूत्रपाहुड)
अर्थः — जे लिंगमां थोडो वा घणो परिग्रहनो अंगीकार छे, ते लिंग जिनवचनमां
निंदा योग्य छे. परिग्रहरहित ज अणगार होय छे. कहे छे के —
धम्मम्मि णिप्पवासो दोसावासो य इच्छुफु ल्लसमो ।
णिष्फलनिग्गुणयारो, णडसवणो णग्गरूवेण ।।७१।। (भावपाहुड)
अर्थः — जे धर्ममां निरुद्यमी अने दोषोनुं घर छे, ते ईक्षुफूल समान निष्फळ छे;
जे गुणोना आचरणथी रहित छे, ते मात्र नग्नरूपवडे नटश्रमण छे – भांडसमान वेषधारी छे.
छठ्ठो अधिकारः कुदेव-कुगुरु-कुधर्म-निराकरण ][ १८१