Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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छे, अनंतवार जन्ममरण करावे छे. माटे हे भद्र! सापने ग्रहण करवो तो भलो छे, परंतु
कुगुरुनुं सेवन भलुं नथी.
बीजी गाथाओ पण त्यां आ श्रद्धान द्रढ करवा माटे घणी कही छे, ते ग्रंथमांथी जोई
लेवी.
संघपट्टकमां पण कह्युं छे के
क्षुत्क्षामः किल कोपि रंकशिशुकः प्रवृज्य चैत्ये क्वचित्,
कृत्वा किंच न पक्षमक्षतकलिः प्राप्तस्तदाचार्यकम्;
चित्रं चैत्यगृहे गृहीयति निजे गच्छे कुटुम्बीयति,
स्वं शक्रीयति बालिशीयति बुधान् विश्व बराकीयति
अर्थःजुओ! क्षुधावडे कृश कोई रंकनुं बाळक, कोई चैत्यालयादिमां दीक्षा धारी,
पापरहित न होवा छतां, कोई पक्षवडे आचार्यपदने प्राप्त थयुं; हवे ते चैत्यालयमां पोताना
घरसमान प्रवर्ते छे, पोताना गच्छमां कुटुंबसमान प्रवर्ते छे, पोताने इंद्रसमान महान माने
छे, ज्ञानीजनोने बाळकसमान अज्ञानी माने छे, तथा सर्व गृहस्थोने रंकसमान माने छे. ए
महान आश्चर्य छे.
वळी‘‘यैर्जातो न च वर्द्धितो न च क्रीतो’’ इत्यादि काव्य छे. जेनाथी जन्म थयो नथी,
वध्यो नथी, मूल्य आपी दीधो नथी, तथा देणदार थयो नथी, इत्यादि कोई प्रकारनो संबंध
नथी, छतां गृहस्थोने बळदनी माफक हांके छे, तथा जोरावरीथी दानादि ले छे, पण हाय!
हाय! आ जगत राजा वडे रहित छे, अर्थात् कोई न्याय पूछवावाळो नथी.
अहीं कोई कहे के‘‘ए तो श्वेतांबररचित उपदेश छे, तेनी साक्षी शामाटे आपो छो?’’
उत्तरःजेम कोई नीचो पुरुष जेनो निषेध करे, तेनो उत्तम पुरुषने तो सहज निषेध
थयो. तेम जेने वस्त्रादि उपकरण कह्यां छे, तेओ पण जेनो निषेध करे, तो दिगंबरधर्ममां
तो एवी विपरीततानो सहज ज निषेध थयो.
वळी दिगंबर ग्रंथोमां पण ए श्रद्धाननां पोषक वचनो छे.
श्रीकुंदकुंदाचार्य षट्पाहुडमां (दर्शनपाहुडमां) पण कह्युं छे के
दंसणमूलो धम्मो उवइट्ठो जिणवरेहिं सिस्साणं
तं सोऊण सकण्णे दंसणहीणो ण वंदिव्वो ।।।। (दर्शनपाहुड)
अर्थःसम्यग्दर्शन छे मूळ जेनुं, एवो जिनवर द्वारा उपदेशेलो धर्म सांभळी, हे
कर्णसहित पुरुषो! तमे एम मानो के सम्यक्त्वरहित जीव वंदन योग्य नथी. जे पोते कुगुरु
१८० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक