धारण करे छे. एटलुं विशेष छे के — ए द्रव्यथी तो नग्न रहे छे, त्यारे आ नानाप्रकारना
५. छोटितदोष – घणी भोजन सामग्री वेरी नाखी अथवा छोडी दई, थोडी भोजनसामग्री ग्रहण
करवी ते, पीरसवावाळाना हाथपर छोडी दीधेली परंतु छाश आदि द्वारा झरती वस्तु ग्रहण करवी ते, भोजन
सामग्री टपकी रहे छे एवा हाथ द्वारा भोजन करवुं ते, बे हाथने जुदा करी भोजन करवुं ते, तथा
अनिष्टआहार छोडी इष्टआहार ग्रहण करवो ते ए पांचे प्रकारनो आहार छोटितदोषसहित आहार छे.
६. अपरिणतदोष – जे आहारजळ गरम छतां पाछळथी ठंडा थई गयां होय, के जेनां वर्ण,
रस, गंध, स्पर्शनुं परिवर्तन न थयुं होय, तेवां आहारजळादि ग्रहण करवां, ते अपरिणतदोषसहित
आहार छे.
७. साधाारणदोष – आकुळता वा भयथी अथवा आदरपूर्वक, वा वस्त्रादिकनुं संकोचन करी सारी
रीते पर्यालोचन कर्या विना ज दातारे आपेलां आहार – औषधादि ग्रहण करवां, ते साधारण दोषसहित
आहार छे.
८. दायकदोष – रजस्वति, गर्भवती, आर्यिका, रक्तपटीकाआदि स्त्रीओ तथा स्मशानमांथी मृतकने
अग्निदाह करी आवेला, सुतकयुक्त, व्याधियुक्त, नपुंसकादिपुरुषो, दायाणी, मद्यपानी, प्रसुता, रोगी,
भूतपिशाचादिथी मूर्छित, पंचश्रमणिका, तेलादिसंस्कारयुक्त, अति नीचा वा ऊंचास्थान पर ऊभेली, अग्निने
फूंकी, जलावी, वधारी राखमां दबावी, जळथी, बूझावी, विखेरी नांखी वा लाकडां वगेरे कम करीने आवेली
होय तेवी, वा घर, आंगणुं, दीवाल लींपती होय, स्नान करती होय, बच्चाने दूध पीतुं छोडीने आवी
होय, अतिशय बालिका होय, वृद्धा होय, रोगी होय, एवी स्त्रीओ तथा टट्टी – पेशाब करीने आवेलो होय,
आक्रांत होय, एवा पुरुषो द्वारा आपेलो आहार दायकदोष सहित छे.
९. लिप्तदोष – गेरू, हडताल, खडी, काचो आटो, लीलुं शाक, अप्रासुक जळ आदिथी लिप्त थयेलो
आहार लेवो, ते लिप्तदोषसहित आहार छे.
१०. मिश्रदोष – सचित्त पृथ्वी, जळ बीज (घउं – जव आदि) हरितकाय (फल – फूल – पात्रादि) त्रस –
जेमां बेइन्द्रियादि जीवो साक्षात् देखाता होय एवा सचित्त-अचित्त अन्नने मिश्रदोषयुकत मान्युं छे तेनो
बनावेलो आहार मिश्रदोषसहित छे.
हवे भोजनक्रिया संबधी चार दोष कहीए छीए –
१. अंगारदोष – आ वस्तु बहु सुंदर अने रुचिकर छे. मने इष्ट छे, कंईक वधारे मळे तो
ठीक, ए प्रमाणे आहारमां अति लंपटतासहित भोजन करवुं, ते अंगारदोषयुकत भोजन छे.
२. धाूमदोष – आ वस्तु बहु ज खराब बनी छे, मने बिलकुल सारी लागती नथी, अने प्रमाणे
आहारमां जुगुप्सा-सहित भोजन करवुं ते धूमदोषसहित भोजन छे.
३. संयोजनदोष – गरमना भेगुं ठंडु, ठंडाना भेगुं गरम, चीकणाना भेगुं रूखुं अने रूखाना
भेगुं चीकणुं, ए प्रमाणे परस्पर विरुद्ध पदार्थोने एकबीजामां मेळवी ग्रहण करवा, ते संयोजनदोष छे.
४. अतिमात्राहारदोष – बे भाग आहार तथा एक भाग जलथी उदर भरवुं ए ज उचित
छे. छतां ए क्रमनुं उल्लंघन करी जे साधु पेट ठांसीने आहार ले, ते अतिमात्राहारदोषसहित भोजन
छे. ए प्रमाणे छेंतालीस दोष छे.
छठ्ठो अधिकारः कुदेव-कुगुरु-कुधर्म-निराकरण ][ १८७