छे, तेम अन्यनुं नाम पण गुरु छे, तोपण अहीं गुरुना श्रद्धानमां निर्ग्रंथ गुरुनुं ज ग्रहण
छे. जैनधर्ममां तो अरहंतदेव, निर्ग्रंथगुरु एवुं प्रसिद्ध वचन छे.
प्रश्नः — ‘निर्ग्रंथ विना अन्यने गुरु न मानवा’ तेनुं शुं कारण?
उत्तरः — निर्ग्रंथ विना अन्य जीव सर्वप्रकारथी महंतता धारतो नथी. जेम कोई
लोभी शास्त्रव्याख्यान करे, त्यां ते आने शास्त्र संभळाववाथी महंत थयो, अने आ तेने
धनवस्त्रादि आपवाथी महंत थयो. जोके बाह्यथी शास्त्र संभळाववावाळो महंत रहे छे, तोपण
अंतरंगमां लोभी होय छे तेथी (दातारने उच्च माने, तथा दातार लोभीने नीचो ज माने,
माटे) तेनामां सर्वथा (बिलकुल) महंतता न थई.
प्रश्नः — निर्ग्रंथ पण आहार तो ले छे?
उत्तरः — लोभी बनी दातारनी सुश्रुषा करी, दीनतापूर्वक ते आहार लेता नथी, तेथी
तेमनी महंतता घटती नथी. जे लोभी होय ते ज हीनता पामे छे. ए ज प्रमाणे अन्य जीव
जाणवा, माटे निर्ग्रंथ ज सर्वप्रकारथी महंततायुक्त छे, पण निर्ग्रंथ विना अन्य जीव
सर्वप्रकारथी गुणवान नथी, गुणोनी अपेक्षाए महंतता, तथा दोषोनी अपेक्षाए हीनता भासे
छे, तेथी तेनी निःशंक स्तुति पण करी शकाय नहि.
वळी निर्ग्रंथ विना अन्य जीव जेवुं धर्मसाधन करे छे, तेवुं वा तेनाथी अधिक धर्मसाधन
गृहस्थ पण करी शके छे, तो त्यां गुरुसंज्ञा कोने होय? माटे बाह्याभ्यंतर परिग्रहरहित
निर्ग्रंथमुनि छे ते ज गुरु छे.
प्रश्नः — आ काळमां एवा गुरु तो अहीं नथी, तेथी जेम अरहंतनी स्थापना
प्रतिमा छे, तेम गुरुनी स्थापना आ वेषधारीओ छे?
उत्तरः — जेम चित्रादिवडे राजानी स्थापना करीए, तो त्यां प्रतिपक्षी नथी, पण कोई
सामान्य मनुष्य पोताने राजा मनावे, तो ते राजानो प्रतिपक्षी थाय छे. तेम पाषाणादिमां
अरहंतादिनी स्थापना बनावे, तो त्यां तेनो कोई प्रतिपक्षी नथी, पण कोई सामान्य मनुष्य
पोताने मुनि मनावे, तो ते मुनिजनोमां प्रतिपक्षी थयो. ए प्रमाणे ज जो स्थापना थती होय
तो पोताने अरहंत पण मनावो! पण तेमनी स्थापना होय तो बाह्यमां तो ए प्रमाणे ज
होवी जोईए; परंतु ते निर्ग्रंथ अने आ घणा परिग्रहनो धारक छे, त्यां एम केवी रीते बने?
प्रश्नः — आ काळमां श्रावक पण जेवा संभवे तेवा नथी, तेथी जेवा श्रावक
तेवा मुनि?
उत्तरः — शास्त्रमां श्रावकसंज्ञा तो सर्व गृहस्थ जैनोने छे. श्रेणिक पण असंयमी हतो
छतां तेने उत्तरपुराणमां श्रावकोत्तम कह्यो. बारसभामां श्रावक कह्या त्यां तेओ बधा व्रतधारी
१९० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक