Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Kudharmanu Niroopan Ane Teni Shraddha Aadino Nishedh.

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ए प्रमाणे कुगुरु सेवननो अहीं निषेध कर्यो.
प्रश्नःकोई तत्त्वश्रद्धानीने ए कुगुरुसेवनथी केवी रीते मिथ्यात्व थयुं?
उत्तरःजेम शीलवती स्त्री पोताना भर्तारनी माफक परपुरुषनी साथे रमणक्रिया
सर्वथा करे नहि, तेम तत्त्वश्रद्धानी पुरुष सुगुरुनी माफक कुगुरुने नमस्कारादि क्रिया सर्वथा
करे नहि. कारण के
ते जीवादितत्त्वनो श्रद्धानी थयो छे, तेथी त्यां रागादिकनो निषेध करनारी
श्रद्धा करे छे, वीतरागभावने श्रेष्ठ माने छे, तेथी जेनामां वीतरागता होय, एवा गुरुने ज
उत्तम जाणी नमस्कारादि करे छे, पण जेनामां रागादिक होय, तेने निषेध जाणी नमस्कार
कदी पण करे नहि.
प्रश्नःजेम राजादिकने (नमस्कारादि) करीए छीए, तेम आमने पण करीए
छीए?
उत्तरःराजादिक कांई धर्मपद्धतिमां नथी, अने गुरुनुं सेवन तो धर्मपद्धतिमां छे,
राजादिकनुं सेवन तो लोभादिकथी थाय छे, एटले त्यां तो चारित्रमोहनो ज उदय संभवे छे,
पण गुरुओना ठेकाणे कुगुरुओने सेव्या, त्यां तत्त्वश्रद्धानना कारणरूप तो गुरु हता, तेमनाथी
आ प्रतिकूळ थयो. हवे लज्जादिकथी पण जेणे कारणमां विपरीतता उपजावी, तेना कार्यभूत
तत्त्वश्रद्धानमां द्रढता क्यांथी होय? माटे त्यां तो दर्शनमोहनो ज उदय संभवे छे. ए प्रमाणे
कुगुरुओनुं निरूपण कर्युं.
हवे कुधर्मनुं निरूपण करीए छीए
कुधार्मनुं निरुपण अने तेनी श्रद्धा आदिनो निषेधा
ज्यां हिंसादिक पाप ऊपजे वा विषयकषायोनी वृद्धि थाय, त्यां धर्म मानीए ते कुधर्म
जाणवो. यज्ञादि क्रियाओमां महाहिंसादि उपजावे, मोटा जीवोनो घात करे, त्यां इन्द्रियोना
विषय पोषण करे. ते जीवो प्रत्ये दुष्टबुद्धि करी रौद्रध्यानी थाय, तीव्रलोभथी अन्यनुं बूरुं
करी, पोतानुं कोई प्रयोजन साधवा इच्छे, अने वळी एवां कार्य करी त्यां धर्म माने, ते सर्व
कुधर्म छे.
वळी तीर्थोमां वा अन्य ठेकाणे स्नानादि कार्य करे, त्यां नानामोटा घणा जीवोनी हिंसा
थाय, पोताना शरीरने सुख ऊपजे, तेथी विषयपोषण थाय छे, तथा कामादिक वधे छे.
कुतूहलादिवडे त्यां कषायभाव वधारे छे अने धर्म माने छे ते कुधर्म छे.
अर्थःशुद्धद्रष्टिवान जीवे भयआशास्नेह अने लोभथी पण कुदेव, कुआगम अने कुलिंगीने
प्रणामविनयादि करवा योग्य नथी.संग्राहकअनुवादक.
१९२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक