संक्रांति, ग्रहण अने व्यतिपातादिमां दान आपे छे, खोटा ग्रहादि अर्थे दान आपे
छे, पात्र जाणीने लोभी पुरुषोने दान आपे छे, दानमां सोनुं, हाथी – घोडा अने तल आदि
वस्तुओ आपे छे, पण संक्रांति आदि पर्व धर्मरूप नथी, ज्योतिषीना संचारादिवडे (गमना-
गमनवडे) संक्रांति आदि थाय छे. तथा दुष्टग्रहादिअर्थे आप्युं त्यां भय, लोभादिकनी अधिकता
थई, तेथी त्यां दान आपवामां धर्म नथी. वळी लोभी पुरुष आपवायोग्य पात्र पण नथी,
कारण के लोभी नानाप्रकारनी असत्य युक्तिओवडे ठगे छे, पण कांई भलुं करतो नथी. भलुं
तो त्यारे थाय के ज्यारे आना दाननी सहायवडे ते धर्म साधे; परंतु ते तो ऊलटो पापरूप
प्रवर्ते छे. हवे पापना सहायकनुं भलुं केवी रीते थाय?
श्री रयणसारशास्त्रमां पण कह्युं छे के —
सप्पुरिसाणं दाणं कप्पतरुणं फलाण सोहं वा ।
लोहीणं दाणं जइ विमाणसोहा सवस्स जाणेह ।।२६।।
अर्थः — सत्पुरुषोने दान आपवुं, ए कल्पवृक्षोना फूलनी शोभा जेवुं तथा सुखदायक
छे, पण लोभी पुरुषोने दान आपवुं थाय छे, ते शब अर्थात् मडदानी ठाठडीनी शोभासमान
जाणवुं. शोभा तो थाय, परंतु धणीने परमदुःखदायक थाय छे, माटे लोभी पुरुषने दान
आपवामां धर्म नथी.
वळी द्रव्य तो एवुं आपीए के जेनाथी तेनो धर्म वधे, पण सुवर्ण, हाथी वगेरे
आपवाथी ए वडे हिंसादि ऊपजे वा मान – लोभादि वधे, अने तेथी महापाप थाय; तेथी एवी
वस्तुओ आपवावाळाने पुण्य क्यांथी थाय?
वळी विषयासक्त जीव रतिदानादिमां पुण्य ठरावे छे. पण प्रत्यक्ष कुशीलादि पाप ज्यां
थाय त्यां पुण्य केवी रीते थाय? तथा युक्ति मेळववा ते कहे छे के – ‘‘ते स्त्री संतोष पामे
छे.’’ पण स्त्री विषयसेवन करवाथी सुख अवश्य पामे, तो पछी शीलनो उपदेश शामाटे
आप्यो? रतिसमय विना पण तेना मनोरथानुसार न प्रवर्ते तो ते दुःख पामे छे; मात्र एवी
असत् युक्ति बनावी तेओ विषय पोषवानो उपदेश आपे छे.
ए प्रमाणे दयादान अने पात्रदान विना अन्य दान आपी त्यां धर्म मानवो, ते सर्व
कुधर्म छे.
वळी कोई, व्रतादि करीने त्यां हिंसादिक वा विषयादिक वधारे छे; पण व्रतादिक तो
ए हिंसा – विषयादि घटाडवा माटे करवामां आवे छे. ज्यां अन्ननो तो त्याग करे पण
कंदमूळादिकोनुं भक्षण करे, तो त्यां हिंसा विशेष थई, तथा स्वादादि विषयनी विशेषता थई.
वळी कोई, दिवसमां तो भोजन करे नहि, पण रात्रिमां भोजन करे छे; हवे त्यां
छठ्ठो अधिकारः कुदेव-कुगुरु-कुधर्म-निराकरण ][ १९३