अधिकार सातमो
जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरुप
आ भवतरुनुं मूळ एक, जाणो मिथ्यात्व भाव;
तेहने करी निर्मूळ हवे, करीए मोक्ष उपाय.
हवे जे जीवो जैन छे तथा जिनआज्ञाने माने छे, तेमने पण मिथ्यात्व रहे छे, तेनुं
अहीं वर्णन करीए छीए — कारण के ए मिथ्यात्वशत्रुनो अंश पण बूरो छे, तेथी ए
सूक्ष्ममिथ्यात्व पण त्यागवा योग्य छे.
जिनागममां निश्चय-व्यवहाररूप वर्णन छे, तेमां यथार्थनुं नाम निश्चय तथा
उपचारनुं नाम व्यवहार छे. तेना स्वरूपने नहि जाणतां अन्यथा प्रवर्ते छे, ते अहीं कहीए
छीए.
✾ केवळ निश्चयनयावलंबी जैनाभासोनुं निरुपण ✾
कोई जीव निश्चयने नहि जाणतां मात्र निश्चयाभासना श्रद्धानी बनी पोताने मोक्षमार्गी
माने छे, पोताना आत्माने सिद्धसमान अनुभवे छे, पण पोते प्रत्यक्ष संसारी होवा छतां
भ्रमथी पोताने सिद्ध माने, ए ज मिथ्याद्रष्टि छे.
शास्त्रोमां आत्माने जे सिद्धसमान कह्यो छे, ते द्रव्यद्रष्टिथी कह्यो छे, पण पर्यायअपेक्षा
सिद्धसमान नथी. जेम राजा अने रंक मनुष्यपणानी अपेक्षाए तो समान छे, पण राजा तथा
रंकपणानी अपेक्षाए तो समान नथी; तेम सिद्ध अने संसारी जीवपणानी अपेक्षाए तो समान
छे, परंतु सिद्धपणा अने संसारीपणानी अपेक्षाए तो समान नथी, छतां आ जीव तो जेवा
सिद्ध शुद्ध छे तेवो ज पोताने शुद्ध माने छे, पण शुद्ध-अशुद्ध अवस्था ए तो पर्याय छे,
ए पर्यायअपेक्षाए समानता मानवामां आवे तो ते ज मिथ्याद्रष्टि छे.
वळी कोई पोताने केवळज्ञानादिनो सद्भाव माने छे. पोताने क्षयोपशमरूप मतिश्रुतादि-
ज्ञाननो सद्भाव छे, अने क्षायिकभाव तो कर्मनो क्षय थतां ज थाय छे, छतां भ्रमथी कर्मनो
क्षय थया विना पण पोताने क्षायिकभाव माने छे, ते पण मिथ्याद्रष्टि छे.
शास्त्रोमां सर्वजीवोनो केवळज्ञानस्वभाव कह्यो छे, पण ते शक्तिअपेक्षाए कह्यो छे,
कारण के – सर्वजीवोमां केवळज्ञानादिरूप थवानी शक्ति तो छे, पण वर्तमान व्यक्तता तो ते व्यक्त
थतां ज कही छे.
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