तेमां सदा होय छे, पण ते व्यक्त छतां ज स्वभाव व्यक्त थयो’ कहेवामां आवे छे.
वळी जेम शीतळस्वभावना कारणे उष्णजळने शीतळ मानी तेनुं पानादि करीए, तो
तेथी दाझवुं ज थाय, तेम केवळज्ञानस्वभावना कारणे अशुद्ध आत्माने केवळज्ञानी मानी
अनुभववामां आवे, तो तेथी दुःखी ज थाय.
ए प्रमाणे जे आत्माने केवळज्ञानादिरूप अनुभवे छे, ते मिथ्याद्रष्टि छे.
वळी कोई पोताने रागादिभाव प्रत्यक्ष होवा छतां पण भ्रमथी आत्माने रागादिरहित
माने छे. त्यां अमे पूछीए छीए के आ रागादि थता जोवामां आवे छे, ते क्या द्रव्यना
अस्तित्वमां छे? जो शरीर वा कर्मरूप पुद्गलना अस्तित्वमां होय तो ए भाव अचेतन वा
मूर्तिक होय, पण आ रागादिक तो प्रत्यक्ष चेतनता सहित अमूर्तिकभाव जणाय छे, माटे ए
भावो आत्माना ज छे.
श्री समयसार-कळशमां पण कह्युं छे के —
कार्यत्वादकृतं न कर्म न च तज्जीवप्रकृत्योर्द्वयो-
रज्ञायाः प्रकृतेः स्वकार्यफलभुग्भावानुषंगात्कृतिः ।
नैकस्याः प्रकृतेरचित्त्वलसनाज्जीवोऽस्य कर्ता ततो
जीवस्यैव च कर्म तच्चिदनुगं ज्ञाता न यत्पुद्गलः ।।२०३।।
ए रागादिरूप भावकर्म छे ते कोई द्वारा नथी कराया एम नथी, केमके ए कार्य-
भूत छे, तथा जीव अने कर्मप्रकृति ए बंनेनुं पण कर्तव्य नथी, कारण — जो एम होय तो
अचेतन कर्मप्रकृतिने पण ते भावकर्मनुं फळ सुख-दुःख तेनुं भोगववुं थाय, परंतु ए असंभव
छे; तथा एकली कर्मप्रकृतिनुं पण ए कर्तव्य नथी, कारण — के तेने अचेतनपणुं प्रगट छे, माटे
ए रागादिकनो कर्ता जीव ज छे, अने ए रागादिक जीवनुं ज कर्म छे, कारण के – भावकर्म
तो चेतनाने अनुसारी छे, चेतना विना होय नहि, तथा पुद्गल ज्ञाता नथी.
ए प्रमाणे रागादिकभाव जीवना अस्तित्वमां छे.
हवे जे रागादिकभावोनुं निमित्त कर्मोने ज मानी पोताने रागादिकनो अकर्ता माने छे,
ते कर्ता तो पोते छे, परंतु पोताने निरुद्यमी बनी प्रमादी रहेवुं छे, तेथी कर्मनो ज दोष
ठरावे छे. ए दुःखदायक भ्रम छे.
श्री समयसार-कळशमां पण एम ज कह्युं छे के –
रागजन्मनि निमित्ततां परद्रव्यमेव कलयंति ये तु ते ।
उत्तरन्ति न हि मोहवाहिनीं शुद्धबोधविधुरान्धबुद्धयः ।।२२१।।
२०० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक