Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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जे जीव रागादिकनी उत्पत्तिमां परद्रव्यनुं ज निमित्तपणुं माने छे, ते जीव पण
शुद्धज्ञानथी रहित छे अंधबुद्धि जेनी, एवो बनी मोहनदीनी पार ऊतरतो नथी.
श्री समयसारना सर्वविशुद्धज्ञानाधिकारमां जे आत्माने अकर्ता माने छे, अने एम कहे
छे केकर्म ज जगाडे छे, सुवाडे छे, परघातकर्मथी हिसा छे, वेदकर्मथी अब्रह्म छे, माटे कर्म
ज कर्ता छे, एम माननार जैनीने सांख्यमती कह्यो छे. जेम सांख्यमती आत्माने शुद्ध मानी
स्वच्छंदी थाय छे, तेम ज आ पण थयो.
एवा श्रद्धानथी आ दोष थयो केरागादिकने पोताना न जाण्या अने पोताने तेनो
अकर्ता मान्यो, एटले रागादिक थवानो भय रह्यो नहि अथवा रागादिक मटाडवानो उपाय
करवानो पण रह्यो नहि, एटले स्वच्छंदी बनी खोटां कर्म बांधी अनंतसंसारमां भटके छे.
प्रश्नःश्री समयसार कळशमां ज एम कह्युं छे के
वर्णाद्या वा रागमोहादयो वा भिन्ना भावाः सर्व एवास्य पुंसः
तेनैवान्तस्तत्त्वतः पश्यतोऽमी नो दृष्टाः स्युर्दृष्टमेकं परं स्यात् ।।३७।।
अर्थःवर्णादिक वा रागादिकभाव छे, ते बधाय आ आत्माथी भिन्न छे.
वळी त्यां ज रागादिकने पुद्गलमय कह्या छे, तथा अन्य शास्त्रोमां पण आत्माने
रागादिकथी भिन्न कह्यो छे, ते केवी रीते छे?
उत्तरःरागादिकभाव परद्रव्यना निमित्तथी औपाधिकभाव थाय छे, अने आ जीव
तेने स्वभाव जाणे छे. जेने स्वभाव जाणे तेने बूरो केम माने? वा तेना नाशनो उद्यम शामाटे
करे? हवे ए श्रद्धान पण विपरीत छे, तेने छोडाववा माटे स्वभावनी अपेक्षाए ए रागादिकने
भिन्न कह्या छे, तथा निमित्तनी मुख्यताथी पुद्गलमय कह्या छे. जेम वैद्य रोगने मटाडवा इच्छे
छे, जो शीतनी अधिकता देखे, तो तेने उष्ण औषधि बतावे, तथा उष्णतानी अधिकता देखे,
तो तेने शीतळ औषधि बतावे, तेम श्रीगुरु रागादिक छोडाववा इच्छे छे. हवे जे रागादिकने
परना मानी स्वच्छंदी बनी निरुद्यमी थाय, तेने तो उपादानकारणनी मुख्यताथी ‘‘रागादिक
आत्माना छे’’ एवुं श्रद्धान कराव्युं; तथा जे रागादिकने पोतानो स्वभाव मानी तेना नाशनो
उद्यम करतो नथी, तेने निमित्तकारणनी मुख्यताथी ‘‘रागादिक परभाव छे’’ एवुं श्रद्धान कराव्युं.
ए बंने विपरीतश्रद्धानथी रहित थतां सत्यश्रद्धान थाय त्यारे ते एम माने के
रागादिकभाव आत्मानो स्वभाव तो नथी, पण कर्मना निमित्तथी आत्माना अस्तित्वमां
विभावपर्याय ऊपजे छे, निमित्त मटतां तेनो नाश थतां स्वभाव रही जाय छे, माटे तेना
नाशनो उद्यम करवो.
सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २०१