प्रश्नः — जो कर्मना निमित्तथी ए थाय छे, तो ज्यांसुधी कर्मनो उदय रहे
त्यांसुधी विभाव केवी रीते दूर थाय? माटे तेनो उद्यम करवो तो निरर्थक छे?
उत्तरः — एक कार्य थवामां अनेक कारणनी आवश्यकता छे, तेमां जे कारण बुद्धि
पूर्वकनां होय, तेने तो उद्यम करी मेळवे, तथा अबुद्धिपूर्वकनां कारण स्वयं मळे, त्यारे कार्यसिद्धि
थाय छे; जेम पुत्र थवानुं कारण बुद्धिपूर्वक तो विवाहादिक करवो ए छे, तथा अबुद्धिपूर्वक
कारण भवितव्य छे, हवे त्यां पुत्रनो अर्थी विवाहादिकनो तो उद्यम करे अने भवितव्य स्वयं
थाय त्यारे पुत्र थाय; तेम विभाव दूर करवानुं कारण बुद्धिपूर्वक तो तत्त्वविचारादिक छे, तथा
अबुद्धिपूर्वक मोहकर्मना उपशमादिक छे. हवे तेनो अर्थी तत्त्वविचारादिकनो तो उद्यम करे, तथा
मोहकर्मना उपशमादिक स्वयं थाय त्यारे रागादिक दूर थाय.
प्रश्नः — जेम विवाहादिक पण भवितव्य आधीन छे, तेम तत्त्वविचारादिक
पण कर्मना क्षयोपशमादिकने आधीन छे, माटे उद्यम करवो निरर्थक छे?
उत्तरः — तत्त्वविचारादि करवायोग्य ज्ञानावरणनो क्षयोपशम तो तेने थयो छे, तेथी
ज उपयोगने त्यां लगाववानो उद्यम करावीए छीए; असंज्ञी जीवोनो क्षयोपशम नथी, तेथी
तेमने शामाटे उपदेश आपीए?
प्रश्नः — होनहार (भावीभाव) होय, तो त्यां उपयोग लागे; होनहार सिवाय
केवी रीते लागे?
उत्तरः — जो एवुं श्रद्धान छे, तो सर्वत्र कोई पण कार्यनो उद्यम तुं न कर. तुं
खानपान अने व्यापारादिकनो तो उद्यम करे छे, अने अहीं होनहार बतावे छे, तेथी जाणीए
छीए के तारो अनुराग ज अहीं नथी; मानादिकथी ज आवी जूठी वातो बनावे छे.
ए प्रमाणे रागादिक होवा छतां पण तेनाथी रहित जे आत्माने माने छे, ते मिथ्याद्रष्टि
जाणवा.
वळी तुं कर्म – नोकर्मनो संबंध होवा छतां पण आत्माने निर्बंध माने छे, पण तेनुं
बंधन तो प्रत्यक्ष जोईए छीए, ज्ञानावरणादिकथी ज्ञानादिकनो घात जोईए छीए, शरीरवडे
तेना अनुसार थती अवस्था जोईए छीए, तो बंधन केवी रीते नथी? जो बंधन न होय
तो मोक्षमार्गी तेना नाशनो उद्यम शामाटे करे?
प्रश्नः — तो शास्त्रोमां आत्माने कर्म{नोकर्मथी भिन्न अबद्धस्पृष्ट केवी रीते
कह्यो छे?
उत्तरः — संबंध अनेक प्रकारना छे, त्यां तादात्म्यसंबंध अपेक्षाए आत्माने कर्म –
२०२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक