‘हुं आवो छुं’ एम शामाटे मानो छो? माटे पोताने शुद्धरूप चिंतवन करवो ए भ्रम छे,
कारण के तमे पोताने सिद्धसमान मान्यो तो आ संसारअवस्था कोनी छे? तथा तमने
केवलज्ञानादि छे, तो आ मतिज्ञानादि कोने छे? तमे द्रव्यकर्म-नोकर्म रहित छो, तो ज्ञानादिकनी
व्यकतता तमने केम नथी? तमे परमानंद छो, तो हवे कर्तव्य शुं रह्युं छे? तथा जन्म-मरणादि
दुःख नथी, तो दुःखी शामाटे थाओ छो? माटे अन्य अवस्थामां अन्य अवस्था मानवी ए
भ्रम छे.
प्रश्नः — तो शास्त्रमां शुद्ध चिंतवन करवानो उपदेश शामाटे आप्यो छे?
उत्तरः — एक द्रव्यअपेक्षाए शुद्धपणुं छे, तथा एक पर्यायअपेक्षाए शुद्धपणुं छे; त्यां
द्रव्यअपेक्षाए तो परद्रव्यथी भिन्नपणुं तथा पोताना भावोथी अभिन्नपणुं तेनुं नाम शुद्धपणुं
छे, तथा पर्यायअपेक्षाए औपाधिकभावोनो अभाव थवो, तेनुं नाम शुद्धपणुं छे. हवे
शुद्धचिंतवनमां तो द्रव्यअपेक्षाए शुद्धपणुं ग्रहण कर्युं छे. श्री समयसार व्याख्यामां पण ए
ज कह्युं छेः —
यथा – ‘प्रमत्तोऽप्रमत्तश्च न भवत्येष एवाशेषद्रव्यांतरभावेभ्यो भिन्नत्वेनोपास्यमानः शुद्ध
इत्यभिलप्यते’(समयसार गाथा – ६नी टीका)
अर्थः — ‘‘आत्मा प्रमत्त-अप्रमत्त नथी; ए ज सर्व परद्रव्योना भावोथी भिन्नपणावडे
सेवतां ‘शुद्ध’ एवो कहीए छीए.’’
वळी त्यां ज एम कह्युं छे के – समस्तकारकचक्रप्रक्रियोत्तीर्णनिर्मलानुभूतिमात्रत्वाच्छुद्धः।
(समयसार गाथा – ७३नी टीका)
अर्थः — समस्त ज कर्ता-कर्म आदि कारकोना समूहनी प्रक्रियाथी पारंगत एवी जे
निर्मळ अनुभूति, अभेदज्ञानतन्मात्र छे, तेथी शुद्ध छे.’’ माटे शुद्ध शब्दनो अर्थ ए प्रमाणे
जाणवो.
केवळशब्दनो अर्थ पण आ ज प्रमाणे जाणवो के ‘परभावथी भिन्न निःकेवळ पोते
ज’ तेनुं नाम केवळ छे. ए ज प्रमाणे अन्य पण यथार्थ अर्थ अवधारवा.
पर्याय अपेक्षाए शुद्धपणुं मानवाथी वा पोताने केवळी मानवाथी महाविपरीतता थाय
छे, माटे पोताने द्रव्यपर्यायरूप अवलोकवो. द्रव्यथी तो सामान्यस्वरूप अवलोकवुं, तथा पर्यायथी
अवस्थाविशेष अवधारवी.
ए ज प्रमाणे चिंतवन करवाथी सम्यग्द्रष्टि थाय छे, कारण के – सत्य अवलोक्या विना
सम्यग्द्रष्टि नाम केवी रीते पामे?
२०४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक