Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Nishchayabhashini Svachandata Ane Temano Nishedh Shastrabhyasani Niratharkata Mananarano Nishedh.

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निश्चयाभासीनी स्वच्छंदता अने तेमनो निषेधा
वळी मोक्षमार्गमां तो रागादिक मटाडवानुं श्रद्धान-ज्ञान-आचरण करवानुं होय छे. तेनो
तो विचार ज नथी, पोताना शुद्ध अनुभवथी ज पोताने सम्यग्द्रष्टि मानी अन्य सर्व
साधनोनो निषेध करे छे.
शास्त्राभ्यासनी निरर्थकता माननारनो निषेधा
शास्त्राभ्यास करवो निरर्थक बतावे छे, द्रव्यादिकना, गुणस्थान-मार्गणास्थानना, अने
त्रिलोकादिकना विचारोने विकल्प ठरावे छे, तपश्चरण करवाने वृथाक्लेश करवो माने छे, व्रतादिक
धारण करवां तेने बंधनमां पडवुं ठरावे छे तथा पूजनादि कार्योने शुभास्रव जाणी त्यागवारूप
प्ररूपे छे,
इत्यादि सर्व साधनोने उठावी प्रमादी बनी परिणमे छे.
जो शास्त्राभ्यास निरर्थक होय तो मुनिओने पण ध्यानअध्ययन ए बे ज कार्य मुख्य
छे. ध्यानमां उपयोग न जोडाय त्यारे अध्ययनमां ज उपयोगने लगावे छे, पण वचमां अन्य
ठेकाणे उपयोग लगाववा योग्य नथी. शास्त्रवडे तो तत्त्वोनां विशेषो जाणवाथी सम्यग्दर्शन-ज्ञान
निर्मळ थाय छे, तथा ज्यां सुधी तेमां उपयोग रहे, त्यां सुधी कषाय मंद रहे छे, अने भावी
वीतरागभावोनी वृद्धि थाय छे, तो एवां कार्योने निरर्थक केम मनाय?
प्रश्नःजैनशास्त्रोमां अध्यात्म उपदेश छे तेनो अभ्यास करवो, अन्य
शास्त्रोना अभ्यासथी कांई सिद्धि नथी?
उत्तरःजो तारी द्रष्टि साची थई छे, तो बधाय जैनशास्त्रो कार्यकारी छे. तेमां
पण मुख्यपणे अध्यात्मशास्त्रोमां तो आत्मस्वरूपनुं कथन मुख्य छे. हवे सम्यग्द्रष्टि थतां
आत्मस्वरूपनो तो निर्णय थई चूक्या पछी, ज्ञाननी निर्मळता माटे वा उपयोगने मंदकषायरूप
राखवा अर्थे अन्य शास्त्रोनो अभ्यास मुख्य जरूरनो छे, तथा आत्मस्वरूपनो निर्णय थयो छे,
तेने स्पष्ट राखवा माटे अध्यात्मशास्त्रोनो अभ्यास पण जरूरनो छे. परंतु अन्य शास्त्रोमां अरुचि
तो न होवी जोईए. जेने अन्य शास्त्रोनी अरुचि छे तेने अध्यात्मनी रुचि पण साची नथी.
जेम केजेनामां विषयासक्तपणुं होय ते विषयासक्त पुरुषोनी कथा पण रुचिथी
सांभळे, विषयना विशेषोने पण जाणे, विषयाचरणमां जे साधनो होय तेने पण हितरूप जाणे,
तथा विषयना स्वरूपने पण ओळखे; तेम जेने आत्मरुचि थई होय, ते आत्मरुचिना धारक
तीर्थंकरादिनां पुराणने पण जाणे, आत्माना विशेषो जाणवा माटे गुणस्थानादिकने पण जाणे,
आत्म आचरणमां जे व्रतादिकसाधन छे तेने पण हितरूप माने तथा आत्माना स्वरूपने पण
ओळखे. ए प्रमाणे चारे अनुयोग कार्यकारी छे.
सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २०५