तथा तेनुं यथार्थ ज्ञान थवा अर्थे शब्दन्यायशास्त्रादिक पण जाणवां जोईए, एटले तेनो
पण पोतानी शक्तिअनुसार थोडो अथवा घणो अभ्यास करवो योग्य छे.
प्रश्नः — पद्मनंदिपंचविंशतिमां एम कह्युं छे के – जे बुद्धि आत्मस्वरूपमांथी
नीकळी बहार शास्त्रोमां विचरे छे, ते बुद्धि व्यभिचारिणी छे?
उत्तरः — ए सत्य कह्युं छे, कारण के – बुद्धि तो आत्मानी छे, ते तेने छोडी परद्रव्य –
शास्त्रोमां अनुरागिणी थई, तेथी तेने व्यभिचारिणी ज कहीए छीए.
परंतु जेम स्त्री शीलवती रहे तो योग्य ज छे, अने तेनाथी न रही शकाय तो उत्तम
पुरुषने छोडी चांडालादिकनुं सेवन करवाथी तो ते अत्यंत निंदनीक थाय, तेम बुद्धि
आत्मस्वरूपमां प्रवर्ते तो ते योग्य ज छे, परंतु न रही शकाय तो प्रशस्तशास्त्रादिक परद्रव्यने
छोडी अप्रशस्तविषयादिकमां लागे तो ते महानिंदनीक ज थाय. हवे मुनिजनोने पण स्वरूपमां
घणोकाळ बुद्धि रहेती नथी, तो तारी केवी रीते रहे छे?
माटे शास्त्राभ्यासमां उपयोग लगाववो योग्य छे.
वळी द्रव्यादिकना अने गुणस्थानादिकना विचारोने तुं विकल्प ठरावे छे, हवे ए विकल्प
तो छे, परंतु उपयोग निर्विकल्प न रहे, अने आ विकल्पोने न करे तो अन्य विकल्प थाय
छे, अने ते घणा रागादिगर्भित होय छे. वळी निर्विकल्पदशा निरंतर रहेती नथी, कारण के
छद्मस्थनो उपयोग एकरूप उत्कृष्ट रहे तो अंतर्मुहूर्त ज रहे छे.
तुं कहीश के — ‘हुं आत्मस्वरूपनुं ज चिंतवन अनेक प्रकारे कर्या करीश’. पण सामान्य
चिंतवनमां तो अनेक प्रकार बनता नथी, तथा विशेष करीश, तो द्रव्य, गुण , पर्याय, गुणस्थान
अने मार्गणादि शुद्ध-अशुद्ध अवस्था इत्यादिकना विचार थशे.
वळी सांभळ, केवळ आत्मज्ञानथी ज तो मोक्षमार्ग थाय नहि, पण सात तत्त्वोनुं
श्रद्धान-ज्ञान थतां तथा रागादिक दूर करतां मोक्षमार्ग थशे. हवे सात तत्त्वोना विशेषो जाणवा
माटे जीव – अजीवना विशेषो वा कर्मना आस्रव-बंधादिकना विशेषो अवश्य जाणवा योग्य छे,
जेथी सम्यग्दर्शन – ज्ञाननी प्राप्ति थाय.
त्यार पछी रागादिक दूर करवा माटे जे रागादिक वधारवानां कारणो होय, तेने छोडी
जे रागादिक घटाडवानां कारणो होय त्यां उपयोगने लगाववो. हवे द्रव्यादिकना वा
गुणस्थानादिकना विचार तो रागादिक घटाडवानां कारणो छे, कारण के एमां कोई रागादिकनुं
निमित्त नथी, माटे सम्यग्द्रष्टि थया पछी पण त्यां ज उपयोग लगाडवो.
प्रश्नः — रागादिक मटाडवानां कारणो जे होय तेमां तो उपयोग लगाववो ठीक
छे, पण त्रिलोकवर्ती जीवोनी गति आदिनो विचार करवो, कर्मोना बंध-उदय-सत्तादिकना
२०६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक