घणा विशेषो जाणवा तथा त्रिलोकना आकार-प्रमाणादिकने जाणवा, इत्यादि विचार शुं
कार्यकारी छे?
उत्तरः — एने विचारतां पण रागादिक वधता नथी, कारण के – ए ज्ञेयो इष्ट –
अनिष्टरूप नथी, तेथी वर्तमान रागादिकनां कारण नथी, तथा एने विशेष जाणतां तत्त्वज्ञान
निर्मळ थाय छे, तेथी ए भावी रागादिक घटाडवानां ज कारण छे, माटे ए कार्यकारी छे.
प्रश्नः — स्वर्ग – नरकादिने जाणवाथी तो त्यां राग{द्वेष थाय छे?
उत्तरः — ज्ञानीने तो एवी बुद्धि थाय नहि, अज्ञानीने थाय. ज्यां पाप छोडी
पुण्यकार्यमां लागे, त्यां कंईक रागादिक घटे ज छे.
प्रश्नः — शास्त्रमां तो एवो उपदेश छे के – प्रयोजनभूत थोडुं ज जाणवुं
कार्यकारी छे, माटे घणा विकल्प शा माटे करीए?
उत्तरः – जे जीव अन्य घणुं जाणे पण प्रयोजनभूतने न जाणे, अथवा जेनी घणुं
जाणवानी शक्ति नथी, तेने ए उपदेश आप्यो छे; पण जेने घणुं जाणवानी शक्ति होय,
तेने तो ए कह्युं नथी के – ‘घणुं जाणवाथी बूरुं थशे.’ तेने तो जेटलुं घणुं जाणशे तेटलुं
प्रयोजनभूत जाणवुं निर्मळ थशे. शास्त्रमां पण एम कह्युं छे के —
‘‘सामान्यशास्त्रतो नुनं विशेषो बलवान् भवेत्
अर्थः — सामान्य शास्त्रथी विशेष बळवान छे,’’ विशेषथी ज सारी रीते निर्णय थाय
छे, माटे विशेष जाणवा योग्य छे.
वळी ते तपश्चरणने व्यर्थ कलेश ठरावे छे. पण मोक्षमार्ग थतां तो संसारी जीवोथी
ऊलटी परिणति जोईए. संसारी जीवोने इष्ट – अनिष्ट सामग्रीथी राग – द्वेष होय छे, त्यारे
आने राग – द्वेष न होय. हवे त्यां राग छोडवा अर्थे तो भोजनादिक इष्टसामग्रीनो ते त्यागी
थाय छे, तथा द्वेष छोडवा अर्थे अनिष्टसामग्री अनशनादिकने अंगीकार करे छे, जो स्वाधीनपणे
एवुं साधन थाय, तो पराधीनपणे इष्ट अनिष्टसामग्री मळतां पण राग – द्वेष न थाय. हवे
जोईए तो ए प्रमाणे, पण तने अनशनादिकथी द्वेष थयो छे, तेथी तेने तुं कलेश ठरावे छे.
ज्यारे ए कलेश थयो, त्यारे भोजनादि करवां स्वयमेव सुख ठर्यां, अने त्यां राग आव्यो,
पण एवी परिणति तो संसारीओने होय ज छे, तो तें मोक्षमार्गी थई शुं कर्युं?
प्रश्नः — कोई सम्यग्द्रष्टि पण तपश्चरण नथी करता?
उत्तरः — कोई कारण विशेषथी तेनाथी तप थई शकतुं नथी, परंतु श्रद्धानमां तो तपने
ते भलुं जाणे छे, अने तेना साधननो उद्यम राखे छे; पण तारुं तो श्रद्धान ज एवुं छे
के – ‘तप करवो कलेश छे,’ तथा तपनो तने उद्यम पण नथी, तो तने सम्यग्दर्शन क्यांथी होय?
सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २०७