प्रश्नः — तो शास्त्रमां एम कह्युं छे के – तप आदि कलेश करे छे तो करो, परंतु
ज्ञान विना सिद्धि नथी, तेनुं शुं कारण?
उत्तरः — जे जीवो तत्त्वज्ञानथी पराङ्मुख छे, तथा तपथी ज मोक्ष माने छे, तेमने
एवो उपदेश आप्यो छे के – ‘‘तत्त्वज्ञान विना केवळ तपथी ज मोक्ष न थाय.’ पण तत्त्वज्ञान
थतां रागादिक मटाडवा माटे तप करवानो तो त्यां निषेध नथी, जो निषेध होय तो गणधरादिक
शामाटे तप करे? माटे पोतानी शक्ति अनुसार तप करवुं योग्य छे.
वळी तुं व्रतादिकने बंधन माने छे, पण स्वच्छंदवृत्ति तो अज्ञानअवस्थामां पण हती
ज, ज्ञान प्राप्त कर्या पछी परिणतिने ते रोके ज छे, तथा ए परिणति रोकवा माटे
बाह्यहिंसादिकनां कारणोनो त्यागी अवश्य थवो जोईए.
प्रश्नः — अमारा परिणाम तो शुद्ध छे, बाह्य त्याग न कर्यो तो न कर्यो?
उत्तरः — जो ए हिंसादि कार्य तारा परिणाम विना स्वयं थतां होय तो अमे एम
ज मानीए, पण तुं पोताना परिणामवडे कार्य करे छे, तो त्यां तारा परिणाम शुद्ध केवी रीते
कहीए? विषयसेवनादिक क्रिया वा प्रमादगमनादिक क्रिया परिणाम विना केवी रीते होय? ए
क्रिया तो तुं पोते उद्यमी थई करे छे तथा त्यां हिसादिक थाय छे तेने तो तुं गणतो नथी,
अने परिणाम शुद्ध माने छे, पण एवी मान्यताथी तारा परिणाम अशुद्ध ज रहेशे.
प्रश्नः — परिणामोने रोकवा, बाह्यहिंसादिक पण घटाडवां, परंतु प्रतिज्ञा
करवामां तो बंध थाय छे, माटे प्रतिज्ञारूप व्रत अंगीकार करवां नहि?
उत्तरः — जे कार्य करवानी आशा रहे तेनी प्रतिज्ञा लेवाती नथी , अने आशा रहे
तेनाथी राग पण रहे छे. तथा ए रागभावथी कार्य कर्या विना पण अविरतिनो बंध थया
ज करे छे, माटे प्रतिज्ञा अवश्य करवी योग्य छे. वळी कार्य करवानुं बंधन थया विना परिणाम
केवी रीते रोकाशे? प्रयोजन पडतां तद्रूपपरिणाम अवश्य थई जाय, वा प्रयोजन पड्या विना
पण तेनी आशा रहे छे, माटे प्रतिज्ञा करवी योग्य छे.
प्रश्नः — प्रतिज्ञा कर्या पछी न जाणे केवो उदय आवशे, अने तेथी पाछळथी
प्रतिज्ञाभंग थाय तो महापाप लागे, माटे प्रारब्धानुसार जे कार्य बने ते बनो, पण
प्रतिज्ञानो विकल्प न करवो?
उत्तरः — प्रतिज्ञा ग्रहण करतां जेनो निर्वाह थवो न जाणे ते प्रतिज्ञा तो न करे,
पण प्रतिज्ञा लेतां ज एवो अभिप्राय रहे के – ‘प्रयोजन पडतां छोडी दईश,’ तो एवी प्रतिज्ञा
शुं कार्यकारी थई? प्रतिज्ञा ग्रहण करतां तो एवो परिणाम होय के – मरणांत थतां
२०८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक