सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २०९
पण प्रतिज्ञा नहि छोडुं, तो एवी प्रतिज्ञा करवी योग्य ज छे. प्रतिज्ञा कर्या विना
अविरत संबंधी बंध मटे नहि.
वळी जो भविष्यना उदयना भयथी प्रतिज्ञा न लेवामां आवे तो, उदयने विचारतां
तो बधाय कर्तव्यनो नाश ज थाय. जेम — पोताने जेटलुं पचतुं जाणे तेटलुं भोजन करे, पण
कदाचित् कोईने भोजनथी अजीर्ण थयुं होय अने ते भयथी पोते भोजन छोडे, तो मरण
ज थाय; तेम पोतानाथी निर्वाह थवो जाणे तेटली प्रतिज्ञा करे, पण कदाचित् कोईने प्रतिज्ञाथी
भ्रष्टपणुं थयुं होय, ते भयथी पोते प्रतिज्ञा करवी छोडी दे तो असंयम ज थाय, माटे जे
बनी शके ते ज प्रतिज्ञा लेवी योग्य छे.
वळी प्रारब्धानुसार कार्य तो बने ज छे, पण तुं उद्यमी बनी भोजनादिक शामाटे
करे छे? जो त्यां उद्यम करे छे, तो त्याग करवानो पण उद्यम करवो योग्य ज छे. ज्यारे
प्रतिमावत् तारी दशा थई जशे, त्यारे अमे प्रारब्ध ज मानीशुं, तारुं कर्तव्य नहि मानीए.
माटे स्वच्छंदी थवानी युक्ति शा माटे बनावे छे? बनी शके ते प्रतिज्ञा करीने व्रत धारण
करवा योग्य ज छे.
✾ शुभने छोMी अशुभमां प्रवर्तवुं योग्य नथी ✾
वळी तुं पूजनादि कार्योने शुभास्रव जाणी हेय माने छे ए सत्य छे, पण जो ए
कार्योने छोडी तुं शुद्धोपयोगरूप थाय तो तो भलुं ज छे, परंतु विषयकषायरूप – अशुभरूप प्रवर्ते
तो तें तारुं पोतानुं बूरुं ज कर्युं.
शुभोपयोगथी स्वर्गादिक थाय, वा भली वासनाथी अथवा भलां निमित्तोथी कर्मना
स्थिति – अनुभाग घटी जाय तो सम्यक्त्वादिकनी पण प्राप्ति थई जाय, अने अशुभोपयोगथी
तो नरक – निगोदादिक थाय, वा बूरी वासना अने बूरां निमित्तोथी कर्मनां स्थिति – अनुभाग
वधी जाय तो सम्यक्त्वादिक महादुर्लभ थई जाय.
वळी शुभोपयोगथी कषाय मंद थाय छे, त्यारे अशुभोपयोगथी तीव्र थाय छे. हवे
मंदकषायनां कार्यो छोडी तीव्रकषायनां कार्य करवां तो एवां छे, के जेम – ‘कडवी वस्तु न खावी
अने विष खावुं,’ पण ए अज्ञानता छे.
प्रश्नः — शास्त्रमां शुभ – अशुभने समान कह्या छे, माटे अमारे तो विशेष
जाणवुं योग्य नथी?
उत्तरः — जे जीव शुभोपयोगने मोक्षनुं कारण मानी उपादेय माने छे, तथा
शुद्धोपयोगने ओळखतो नथी, तेने अशुद्धतानी अपेक्षा वा बंधकारणनी अपेक्षा शुभ – अशुभ
बंनेने समान बताव्या छे.