Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Keval Nishchayavalambi Jivani Pravrutti.

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२१० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
तथा शुभअशुभनो परस्पर विचार करीए तो शुभभावोमां कषाय मंद थाय छे, तेथी
बंघ हीन थाय छे, तथा अशुभभावोमां कषाय तीव्र थाय छे अने तेथी बंध घणो थाय छे,
ए प्रमाणे विचार करतां सिद्धांतमां अशुभनी अपेक्षाए शुभने भलो पण कहे छे. जेम
रोग तो थोडो वा घणो बूरो ज छे, परंतु घणा रोगनी अपेक्षाए थोडा रोगने भलो पण
कहीए छीए.
माटे शुद्धोपयोग न होय त्यारे अशुभथी छूटी शुभमां प्रवर्तवुं योग्य छे, पण शुभने
छोडी अशुभमां प्रवर्तवुं तो योग्य नथी.
प्रश्नःकामादिक वा क्षुधादिक मटाडवा माटे अशुभरूप प्रवृत्ति तो थया विना
रहेती नथी, तथा शुभप्रवृत्ति इच्छा करीने करवी पडे छे. ज्ञानीने इच्छा करवी नथी,
माटे शुभनो उद्यम न करवो?
उत्तरःशुभप्रवृत्तिमां उपयोग लागवाथी वा तेना निमित्तथी विरागता वधवाथी
कामादिक हीन थाय छे; क्षुधादिकमां पण संकलेश थोडो थाय छे, माटे शुभोपयोगनो अभ्यास
करवो. उद्यम करवा छतां पण जो कामादिक वा क्षुधादिकनी पीडा रहे, तो तेना अर्थे जेथी
थोडुं पाप लागे ते करवुं, पण शुभोपयोगने छोडी निःशंक पापरूप प्रवर्तवुं तो योग्य नथी.
वळी तुं कहे छे के‘‘ज्ञानीने इच्छा नथी, अने शुभोपयोग इच्छा करवाथी थाय छे;’’
पण जेम कोई पुरुष किंचित्मात्र पण पोतानुं धन आपवा इच्छतो नथी, परंतु ज्यां घणुं
धन ज्तुं जाणे, त्यां पोतानी इच्छाथी अल्पधन आपवानो उपाय करे छे; तेम ज्ञानी किंचित्मात्र
पण कषायरूप कार्य करवा इच्छतो नथी, परंतु ज्यां घणा कषायरूप अशुभकार्य थतुं जाणे,
त्यां इच्छा करीने अल्पकषायरूप शुभकार्य करवानो उद्यम करे छे.
ए प्रमाणे आ वात सिद्ध थई केज्यां शुद्धोपयोग थतो जाणे त्यां तो शुभकार्यनो
निषेध ज छे, अने ज्यां अशुभोपयोग थतो जाणे, त्यां शुभकार्य उपायवडे अंगीकार करवा
योग्य छे.
ए प्रमाणे जे अनेक व्यवहारकार्योने उथापी स्वच्छंदपणाने स्थापे छे, तेनो निषेध कर्यो.
केवळ निश्चयावलंबी जीवनी प्रवृत्ति
हवे ए केवळ निश्चयावलंबी जीवनी प्रवृत्ति दर्शावीए छीए.
एक शुद्धात्माने जाणवाथी ज्ञानी थई जाय छे, अन्य कशानी जरूर नथी;एवुं जाणी
कोई वेळा एकांतमां बेसी ध्यानमुद्रा धारी ‘‘हुं सर्वकर्मउपाधिरहित सिद्धसमान आत्मा छुं.’’
इत्यादि विचारवडे ते संतुष्ट थाय छे; पण ए विशेषण केवी रीते संभवित छे तेनो विचार