Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २११
नथी. अथवा अचल, अखंडित अने अनुपमादि विशेषणोवडे आत्माने ध्यावे छे; पण ए
विशेषणो तो अन्य द्रव्योमां पण संभवे छे. वळी ए विशेषणो कई अपेक्षाए छे, तेनो विचार
नथी. कोई वेळा सूतां
बेसतां जेते अवस्थामां एवो विचार राखी पोताने ज्ञानी माने छे.
ज्ञानीने आस्रवबंध नथी,’एम आगममां कह्युं छे. तेथी कोई वेळा विषय-कषायरूप
थाय छे त्यां बंध थवानो भय नथी, मात्र स्वच्छंदी बनी रागादिरूप प्रवर्ते छे.
स्वपरने जाण्यानुं चिह्न तो वैराग्यभाव छे. श्री समयसार निर्जरा अधिकार कळशमां
पण कह्युं छे केसम्यग्दृष्टेर्भवति नियतं ज्ञानवैराग्यशक्ति : (कळश१३६)
अर्थःसम्यग्द्रष्टिने निश्चयथी ज्ञानवैराग्यशक्ति होय छे.
तथा त्यां एम पण कह्युं छे के
सम्यग्दृष्टिः स्वयमयमहं जातु बन्धो न मे स्या-
दित्युत्तानोत्पुलकवदना रागिणोऽप्याचरन्तु
आलम्बन्तां समितिपरतां ते यतोऽद्यापि पापा
आत्मानात्मावगमविरहात्सन्ति सम्यक्त्वरिक्ताः
।।१३७।।
अर्थःपोतानी मेळे ज ‘‘हुं सम्यग्द्रष्टि छुं, मने कदीपण बंध नथी’’ ए प्रमाणे
ऊंचुं फुलाव्युं छे मुख जेणे, एवा रागी, वैराग्यशक्तिरहित पण आचरण करे छे तो करो,
तथा कोई पांच समितिनी सावधानताने अवलंबे छे तो अवलंबो, परंतु ज्ञानशक्ति विना हजु
पण ते पापी ज छे; ए बंने आत्मा
अनात्माना ज्ञानरहितपणाथी सम्यक्त्वरहित ज छे.
वळी अमे पूछीए छीएपरने पर जाण्युं, तो परद्रव्यमां रागादि करवानुं शुं
प्रयोजन रह्युं? त्यां ते कहे छेमोहना उदयथी रागादि थाय छे, पूर्वे भरतादि ज्ञानी
थया तेमने पण विषयकषायरूप कार्य थयां सांभळीए छीए?
उत्तरःज्ञानीने पण मोहना उदयथी रागादिक थाय छे ए सत्य छे, परंतु
बुद्धिपूर्वक रागादिक थतां नथी, तेनुं विशेष वर्णन आगळ करीशुं.
जेने रागादि थवानो कंईपण खेद नथीतेना नाशनो उपाय नथी, तेने ‘‘रागादिक बूरा
छे’’एवुं श्रद्धान पण संभवतुं नथी. अने एवा श्रद्धान विना ते सम्यग्द्रष्टि केवी रीते होय?
जीवअजीवादि तत्त्वोनुं श्रद्धान करवानुं प्रयोजन तो एटलुं ज श्रद्धान छे.
वळी भरतादि सम्यग्द्रष्टिओने विषयकषायोनी प्रवृत्ति जेवी रीते होय छे, ते
पण आगळ विशेषरूप कहीशुं; तुं तेमना उदाहरण वडे स्वच्छंदी थईश तो तने तीव्र आस्रव
बंध थशे.