Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२१२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
श्रीसमयसार कळशमां पण ए ज कह्युं छे के‘‘मग्ना ज्ञाननयैषिणोऽपि यदतिस्वच्छन्द-
मन्दोद्यमाः (समयसार कळश१११)
अर्थःज्ञाननयने अवलोकवावाळा पण जे स्वच्छंदी अने मंद उद्यमी थाय छे ते
पण संसारमां बूडे छे’’
तथा त्यां अन्य पण ‘‘ज्ञानिन् कर्म न जातु कर्तृमुचितं’’ (समयसार कळश१५१)
इत्यादि कळशमां वा ‘‘तथापि न निरर्गलं चरितुमिष्यते ज्ञानिनां’’ (समयसार कळश१६६) इत्यादि
कळशमां स्वच्छंदी थवानो निषेध कर्यो छे. इच्छा विना जे कार्य थाय ते कर्मबंधनुं कारण नथी
पण पोताना अभिप्रायथी कर्ता थई करे, अने ज्ञाता रहे एम तो बने नहि, इत्यादि निरूपण
कर्युं छे.
माटे रागादिकने बूराअहितकारी जाणी तेना नाशने अर्थे उद्यम राखवो.
तेना अनुक्रममां पहेलां तीव्ररागादि पण छोडवा अर्थे अनेक अशुभकार्यो छोडी
शुभकार्यमां लागवुं, पछी मंदरागादि पण छोडवा अर्थे शुभने पण छोडी शुद्धोपयोगरूप थवुं.
वळी केटलाक जीवो अशुभमां कलेश मानीने व्यापारादि वा स्त्रीसेवनादि कार्योने पण
घटाडे छे, तथा शुभने हेय जाणी शास्त्राभ्यासादि कार्योमां प्रवर्तता नथी, अने वीतरागभावरूप
शुद्धोपयोगने प्राप्त थया नथी, तेथी ते जीवो धर्म
अर्थकाममोक्षरूप पुरुषार्थथी रहित थई
आळसुनिरुद्यमी थाय छे.
तेनी निंदा पंचास्तिकायनी व्याख्यामां करी छे. त्यां द्रष्टांत आप्युं छे के‘‘जेम घणी
१. येऽत्र केवलनिश्चयावलम्बिनः सकलक्रियाकर्मकाण्डाडम्बरविरक्त बुद्धयोऽर्धमीलितविलोचनपुटाः किमपि
स्वबुद्धयावलोक्य यथासुखमासते; ते खल्ववधीरितभिन्नसाध्यसाधनभावा अभिन्नसाध्यसाधनभावमलभमाना अन्तराल एव
प्रमादकादम्बरीमदभरालसचेतसो मत्ता इव, मूर्च्छिता इव, सुषुप्ता इव, प्रभूतघृतसितोपलपायसासादिकसाहित्या इव,
समुल्बणबलसज्जनितजाडया इव, दारुणमनोभ्रंशविहितमोह इव, मुद्रितविशिष्टचैतन्या वनस्पतय इव, मौनीन्द्रीं कर्मचेतनां
पुण्यबन्धभयेनानवलम्बमाना अनासादितपरमनैष्कर्म्यरुपज्ञानचेतनाविश्रान्तयो व्यक्ताव्यक्त प्रमादतन्द्रा अरमागतकर्मफल-
चेतनाप्रधानप्रवृत्तयो वनस्पतय इव केवलं पापमेव बध्नन्ति
अर्थःजे जीवो केवल निश्चयनयना अवलंबी छे, व्यवहाररूप स्वसमयमय क्रियाकर्मकांडने
आडंबर जाणी व्रतादिकमां विरागी बनी रह्या छे, तेओ अर्धउन्मीलित लोचनथी ऊर्ध्वमुखी बनी
स्वच्छंदवृत्तिने धारण करे छे. कोई कोई पोतानी बुद्धिथी एवुं माने छे के‘‘अमे स्वरूपने अनुभवीए
छीए’’ एवी समजणथी सुखरूप प्रवर्ते छे, तेओ भिन्न साध्यसाधनभावरूप व्यवहारने तो मानता
नथी पण निश्चयरूप अभिन्न साध्यसाधनने पोतानामां मानता छतां एम ज ब्हेकी रह्या छे, वस्तुतत्त्वने
पामता नथी, एवा जीवो न निश्चयपदने प्राप्त थाय छे केन व्यवहारपदने प्राप्त थाय छे, परंतु इतोभ्रष्ट
उतोभ्रष्ट बनी अधवचमां ज प्रमादरूपी मदिराना प्रभावथी चित्तमां मतवाला बनी मूर्च्छित जेवा थई