सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २१३
खीर – खांड खाई पुरुष आळसु थाय छे, वा जेम वृक्ष निरुद्यमी छे, तेम ते जीवो आळसु –
निरुद्यमी थया छे.’’
हवे तमने पूछीए छीए के – तमे बाह्य तो शुभ – अशुभ कायोेर्ने घटाड्यां, पण उपयोग
तो आलंबन विना रहेतो नथी, तो तमारो उपयोग क्यां रहे छे? ते कहो.
जो ते कहो के – ‘‘आत्मानुं चिंतवन करीए छीए.’’ तो शास्त्रादिवडे अनेक प्रकारना
आत्माना विचारोने तो तें विकल्प ठराव्या, तथा कोई विशेषणथी आत्माने जाणवामां घणो
काळ लागे नहि, कारण के – वारंवार एकरूप चिंतवनमां छद्मस्थनो उपयोग लागतो नथी.
श्रीगणधरादिकनो पण उपयोग ए प्रमाणे रही शकतो नथी, तेथी तेओ पण शास्त्रादि कार्योमां
प्रवर्ते छे, तो तारो उपयोग श्रीगणधरादिथी पण शुद्ध थयो केम मानीए? तेथी तारुं कहेवुं
प्रमाण नथी.
जेम कोई व्यापारादिकमां निरुद्यमी थई व्यर्थ जेमतेम काळ गुमावे, तेम तुं धर्ममां
निरुद्यमी थई प्रमादसहित ए ज प्रमाणे व्यर्थ काळ गुमावे छे. कोई वेळा कांई चिंतवन जेवुं
करे छे, कोई वेळा वातो बनावे छे, तथा कोई वेळा भोजनादि करे छे; पण पोतानो उपयोग
निर्मळ करवा माटे तुं शास्त्राभ्यास, तपश्चरण अने भक्ति आदि कार्योमां प्रवर्ततो नथी; मात्र
शून्य जेवो प्रमादी थवानुं नाम शुद्धोपयोग ठरावी, त्यां कलेश थोडो थवाथी जेम कोई आळसु
बनी पड्या रहेवामां सुख माने, तेम तुं आनंद माने छे.
अथवा जेम कोई स्वप्नमां पोताने राजा मानी सुखी थाय तेम तुं पोताने भ्रमथी
सिद्धसमान शुद्ध मानी पोतानी मेळे ज आनंदित थाय छे, अथवा जेम कोई ठेकाणे रति
मानी कोई सुखी थाय, तेम कांईक विचार करवामां रति मानी सुखी थाय तेने तुं अनुभव-
जनित आनंद कहे छे. वळी जेम कोई, कोई ठेकाणे अरति मानी उदास थाय छे, तेम
रह्या छे. जेम कोई घणां घी – साकर – दूध आदि गरिष्ट (भारे) वस्तुना भोजन – पानथी सुथिर – आळसु
बनी रहे छे, अर्थात् पोताना उत्कृष्ट देहना बळथी जड जेवा बनी रहे छे, तेम तेओ महा भयानक
भावथी समजो के – मननी भ्रष्टताथी मोहित – विक्षिप्त थई रह्या छे, चैतन्यभावथी रहित जाणे वनस्पति
ज छे, मुनिपद प्राप्त करनारी कर्मचेतनाने पुण्यबंधना भयथी अवलंबन करता नथी तथा परम
निष्कर्मदशारूप ज्ञानचेतनाने पण अंगीकार करी ज नथी, तेथी तेओ अतिशय चंचळभावोने धारी रह्या
छे, प्रगट अने अप्रगटरूप प्रमादना आधीन थई रह्या छे; एवा जीवो महा अशुद्धोपयोगथी
आगामीकाळमां कर्मफळचेतनाथी प्रधान थता थका वनस्पतिसमान जड बनी केवळ पापने ज बांधवावाळा
छे. कह्युं छे के –
‘‘णिच्छयमालम्बता णिच्छयदो णिच्छयं अयाणंता;
णसंति चरणकरणं बाहरिचरणालसा केई ।’’
(श्री पंचास्तिकाय गाथा – १७२नी व्याख्यामांथी) — अनुवादक.