२१४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
व्यापारादिक अने पुत्रादिकने खेदनुं कारण जाणी तेनाथी उदास रहे छे तेने तुं वैराग्य माने
छे; पण एवां ज्ञान – वैराग्य तो कषायगर्भित छे. वीतरागरूप उदासीनदशामां तो जे
निराकुळता थाय छे ते साचो आनंद, ज्ञान, वैराग्य ज्ञानी जीवोने चारित्रमोहनी हीनता थतां
प्रगट थाय छे.
वळी ते व्यापारादि कलेश छोडी इच्छानुसार भोजनादिवडे सुखी थतो प्रवर्ते छे, अने
पोताने त्यां कषायरहित माने छे, परंतु ए प्रमाणे आनंदरूप थतां तो रौद्रध्यान होय छे.
अने ज्यां सुखसामग्री छोडी दुःखसामग्रीनो संयोग थतां संकलेश न थाय, राग – द्वेष न ऊपजे
त्यां निष्कषायभाव होय छे.
ए प्रमाणे भ्रमरूप प्रवृत्ति तेमनी होय छे.
ए प्रकारे जे जीवो केवळ निश्चयाभासना अवलंबी छे, ते मिथ्याद्रष्टि जाणवा. जेम
वेदांती वा सांख्यमतवाळा जीव केवळशुद्धात्माना श्रद्धानी छे, तेम आ पण जाणवा; कारण के –
श्रद्धाननी समानताथी तेमनो उपदेश आमने इष्ट लागे छे, अने आनो उपदेश तेमने इष्ट
लागे छे.
✾ स्वद्रव्य – परद्रव्यनां चिंतवनवMे निर्जरा – बंधानो प्रतिबंधा ✾
वळी ते जीवोने एवुं श्रद्धान छे के – केवळ शुद्धात्माना चिंतवनथी तो संवर – निर्जरा थाय
छे, वा त्यां मुक्तात्माना सुखनो अंश प्रगट थाय छे; तथा जीवना गुणस्थानादि अशुद्धभावोनुं
अने पोताना सिवाय अन्य जीव – पुद्गलादिनुं चिंतवन करवाथी आस्रव – बंध थाय छे, माटे
ते अन्य विचारथी पराङ्मुख रहे छे.
ए पण सत्यश्रद्धान नथी; कारण के – शुद्ध स्वद्रव्यनुं चिंतवन करो अथवा अन्य चिंतवन
करो, पण जो वीतरागसहित भाव होय, तो त्यां संवर – निर्जरा ज छे अने ज्यां रागादिरूप
भाव होय, त्यां आस्रव – बंध ज छे; जो परद्रव्यने जाणवाथी ज आस्रव – बंध थाय तो
केवळीभगवान समस्त परद्रव्यने जाणे छे, तेथी तेमने पण आस्रव – बंध थाय.
प्रश्नः — छद्मस्थने तो परद्रव्यचिंतवन थतां आस्रव – बंध थाय छे?
उत्तरः — एम पण नथी. कारण के शुकलध्यानमां पण मुनिओने छए द्रव्योनां द्रव्य-
गुणपर्यायनुं चिंतवन होवुं निरूपण कर्युं छे. अवधि – मनःपर्ययादिमां परद्रव्यने जाणवानी ज
विशेषता होय छे, वळी चोथागुणस्थानमां कोई पोताना स्वरूपनुं चिंतवन करे छे, तेने पण
आस्रव – बंध वधारे छे, तथा गुणश्रेणी निर्जरा नथी; त्यारे पांचमा – छठ्ठा गुणस्थानमां आहार –
विहारादि क्रिया होवा छतां परद्रव्य चिंतवनथी पण आस्रव – बंध थोडो छे, अने गुणश्रेणी –
निर्जरा थया ज करे छे. माटे स्वद्रव्यना – परद्रव्यना चिंतवनथी निर्जरा – बंध नथी, पण रागादिक