सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २१५
घटतां निर्जरा छे. तथा रागादिक थतां बंध छे, तने रागादिकना स्वरूपनुं यथार्थ ज्ञान नथी,
तेथी अन्यथा माने छे.
✾ निर्विकल्प दशानो विचार ✾
प्रश्नः — जो एम छे, तो निर्विकल्प अनुभवदशामां नय – प्रमाण – निक्षेपादिनो
वा दर्शन – ज्ञानादिकना पण विकल्पोनो निषेध कर्यो छे, तेनुं शुं कारण?
उत्तरः — जे जीव ए ज विकल्पोमां लागी रहे छे, अने अभेदरूप एक पोताना
आत्माने अनुभवता नथी, तेमने एवो उपदेश आप्यो छे के – ए सर्व विकल्पो वस्तुनो निश्चय
करवा माटे कारण छे, वस्तुनो निश्चय थतां एनुं कांई प्रयोजन रहेतुं नथी; माटे ए विकल्पोने
पण छोडी अभेदरूप एक आत्मानो अनुभव करवो, पण एना विचाररूप विकल्पोमां ज फसाय
रहेवुं योग्य नथी.
वळी वस्तुनो निश्चय थया पछी पण एम नथी के – सामान्यरूप स्वद्रव्यनुं ज चिंतवन
रह्या करे, त्यां तो स्वद्रव्य वा परद्रव्यनुं सामान्यरूप वा विशेषरूप जाणवुं थाय छे. पण ते
वीतरागता सहित थाय छे, अने तेनुं ज नाम निर्विकल्पदशा छे.
प्रश्नः — त्यां तो घणा विकल्प थया. तो निर्विकल्पदशा केवी रीते संभवे छे?
उत्तरः — निर्विचार थवानुं नाम निर्विकल्प नथी, केमके छद्मस्थनुं जाणवुं विचार सहित
होय छे, तेनो अभाव मानतां ज्ञाननो पण अभाव थाय त्यारे ए तो जडपणुं थयुं, पण
आत्माने ए होतुं नथी; माटे विचार तो रहे छे.
वळी जो एक सामान्यनो ज विचार रहे छे, विशेषनो नहि – एम कहीए, तो
सामान्यनो विचार तो घणोकाळ रहेतो नथी, वा विशेषनी अपेक्षा विना सामान्यनुं स्वरूप
भासतुं नथी.
अहीं जो एम कहीए के — ‘पोतानो ज विचार रहे छे, परनो नहि.’ पण परमां
परबुद्धि थया विना, निजमां निजबुद्धि केवी रीते आवे?
त्यारे ते कहे छे के — ‘‘श्री समयसारमां एम कह्युं छे के —
भावयेत् भेदविज्ञानमिदमच्छिन्नधारया ।
तावद्यावत्पराच्च्युत्वा ज्ञानं ज्ञाने प्रतिष्ठते ।। (कळश – १३०)
अर्थः – आ भेदविज्ञान त्यां सुधी निरंतर भाववुं के – ज्यांसुधी परथी छूटी ज्ञान
ज्ञानमां स्थिर थाय, माटे भेदविज्ञान छूटतां परनुं जाणवुं मटी जाय छे, केवळ पोते पोताने
ज जाण्या करे छे.’’