Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२१६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
हवे त्यां तो आम कह्युं छे केपूर्वे स्वपरने एक जाणतो हतो, पछी ए बंने जुदां
जाणवा माटे भेदज्ञानने त्यां सुधी ज भाववुं योग्य छे केज्यांसुधी ज्ञान पररूपने भिन्न
जाणी पोताना ज्ञानस्वरूपमां ज निश्चित थाय, पण ते पछी भेदविज्ञान करवानुं प्रयोजन रहेतुं
नथी; परने पररूप अने आपने आपरूप स्वयं जाण्या ज करे छे; पण अहीं एम नथी के
परद्रव्यने जाणवानुं ज मटी जाय छे. कारण के परद्रव्यने जाणवां वा स्वद्रव्यना विशेषो
जाणवानुं नाम विकल्प नथी.
तो केवी रीते छे? ते कहीए छीएरागद्वेषवशथी कोई ज्ञेयने जाणवामां उपयोग
लगाववो, वा कोई ज्ञेयने जाणतां उपयोगने छोडाववो, ए प्रमाणे वारंवार उपयोगने भमाववो
तेनुं नाम विकल्प छे. तथा ज्यां वीतरागरूप थई जेने जाणे छे तेने यथार्थ जाणे छे, अन्य
अन्य ज्ञेयने जाणवा माटे उपयोगने भमावतो नथी त्यां निर्विकल्पदशा जाणवी.
प्रश्नःछद्मस्थनो उपयोग तो नाना ज्ञेयमां अवश्य भमे, तो त्यां
निर्विकल्पता केवी रीते संभवे?
उत्तरःजेटलो काळ एक जाणवारूप रहे, तेटलो काळ निर्विकल्पता नाम पामे,
सिद्धांतमां ध्याननुं लक्षण एवुं ज कह्युं छे.
एकाग्रचिंतानिरोधो ध्यानम् (मोक्षशास्त्र अ. ८ सूत्र २७)
अर्थात् एकनुं मुख्य चिंतवन होय तथा अन्य चिंतवन रोकाय तेनुं नाम ध्यान छे.
सूत्रनी सर्वार्थसिद्धि टीकामां तो आम विशेष कह्युं छे के‘‘जो सर्व चिंता रोकवानुं नाम ध्यान
होय तो अचेतनपणुं थई जाण.’’ वळी एवी पण विवक्षा छे केसंतान अपेक्षा नाना ज्ञेयनुं
पण जाणवुं थाय छे, परंतु ज्यांसुधी वीतरागता रहे, रागादिक वडे पोते उपयोगने भमावे
नहि, त्यां सुधी निर्विकल्पदशा कहीए छीए.
प्रश्नःजो एम छे, तो परद्रव्यथी छोडावी उपयोगने स्वरूपमां लगाववानो
उपदेश शामाटे आप्यो छे?
उत्तरःजे शुभअशुभ भावोनां कारणरूप परद्रव्य छे, तेमां उपयोग लागतां जेने
रागद्वेष थई आवे छे, तथा स्वरूपचिंतवन करे तो जेने रागद्वेष घटे छे, एवा नीचली
अवस्थावाळा जीवोने पूर्वोक्त उपदेश छे. जेमकोई स्त्री विकारभावथी कोईना घरे जती हती,
तेने मनाई करी के परघरे न जा, घरमां बेसी रहे; तथा जे स्त्री निर्विकारभावथी कोईना
घरे जाय, अने यथायोग्य प्रवर्ते तो कांई दोष नथी; तेम उपयोगरूप परिणति राग
द्वेषभावथी
परद्रव्योमां प्रवर्त्तती हती, तेने मना करी रह्युं के ‘परद्रव्योमां न प्रवर्त, स्वरूपमां मग्न रहे;’
पण जे उपयोगरूप परिणति वीतरागभावथी परद्रव्योने जाणी यथायोग्य प्रवर्त्ते तो तेने कांई
दोष नथी.