सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २१७
प्रश्नः — जो एम छे, तो महामुनि परिग्रहादिना चिंतवननो त्याग शामाटे करे छे?
उत्तरः — जेम विकाररहित स्त्री कुशीलना कारणरूप परघरोनो त्याग करे छे, तेम
वीतराग परिणति राग – द्वेषना कारणरूप परद्रव्योनो त्याग करे छे; पण जे व्यभिचारनां कारण
नथी एवां परघर जवानो त्याग नथी; तेम जे राग – द्वेषनां कारण नथी एवां परद्रव्य
जाणवानो त्याग नथी.
त्यारे ते कहे छे के – जेम स्त्री प्रयोजन जाणी पितादिकना घरे जाय तो भले जाय,
पण प्रयोजन विना जेना – तेना घरे जवुं ते योग्य नथी; तेम परिणतिने प्रयोजन जाणी सप्त
तत्त्वोनो विचार करवो तो योग्य छे, परंतु विना प्रयोजन गुणस्थानादिकनो विचार करवो योग्य
नथी.
समाधानः — जेम स्त्री प्रयोजन जाणी पितादि वा मित्रादिकना घरे पण जाय, तेम
परिणति तत्त्वोनां विशेष जाणवा माटे गुणस्थानादिक अने कर्मादिकने पण जाणे. अहीं एम
जाणवुं के – जेम शीलवती स्त्री उद्यम करीने तो विटपुरुषना स्थानमां जती नथी, पण
परवशताथी त्यां जवुं बनी जाय, अने त्यां कुशील न सेवे, तो ते स्त्री शीलवती ज छे; तेम
वीतराग परिणति उपाय करीने तो रागादिक माटे परद्रव्योमां लागे नहि. पण स्वयं तेनुं जाणवुं
थई जाय, अने त्यां रागादिक न करे तो ते परिणति शुद्ध ज छे. तेथी स्त्री आदिनो परिषह
मुनिजनोने होय अने तेने तेओ जाणे ज नहि, मात्र पोताना स्वरूपनुं जाणवुं ज रहे – एम
मानवुं मिथ्या छे; तेने तेओ जाणे तो छे, परंतु रागादिक करता नथी.
ए प्रमाणे परद्रव्योने जाणवा छतां पण वीतरागभाव होय छे, एवुं श्रद्धान करवुं.
प्रश्नः — जो एम छे, तो शास्त्रमां एम शामाटे कह्युं छे के — आत्मानुं
श्रद्धान – ज्ञान – आचरण सम्यग्दर्शन – ज्ञान – चारित्र छे?
उत्तरः — अनादिकाळथी परद्रव्योमां पोतारूपे श्रद्धान – ज्ञान – आचरण हतुं तेने
छोडाववा माटे ए उपदेश छे. पोतानामां ज पोतारूप श्रद्धान – ज्ञान – आचरण थवाथी परद्रव्यमां
राग – द्वेषादि परिणति करवानुं श्रद्धान – ज्ञान वा आचरण मटी जाय त्यारे सम्यग्दर्शनादि थाय
छे; पण जो परद्रव्यनुं परद्रव्यरूप श्रद्धानादि करवाथी सम्यग्दर्शनादि न थतां होय, तो
केवळीभगवानने पण तेनो अभाव थाय. ज्यां परद्रव्यने बूरां जाणवां तथा निजद्रव्यने भलुं
जाणवुं थाय त्यां तो राग – द्वेष सहज ज थया; पण ज्यां आपने आपरूप तथा परने पररूप
यथार्थ जाण्या करे तथा तेवुं ज श्रद्धानादिरूप प्रवर्तन करे त्यारे ज सम्यग्दर्शनादिक थाय छे
एम जाणवुं.
माटे घणुं शुं कहीए! जेम रागादिक मटाडवानुं श्रद्धान थाय ते ज श्रद्धान