Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Keval Vyavaharavalmbi Jainabhashonu Niroopan Kul Apeshae Dhrmadharak Vyavaharabhashi.

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२१८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
सम्यग्दर्शन छे, जेम रागादिक मटाडवानुं जाणवुं थाय ते ज जाणवुं सम्यग्ज्ञान
छे, तथा जेम रागादिक मटे ते ज आचरण सम्यक्चारित्र छे अने एवो ज
मोक्षमार्ग मानवो योग्य छे.
ए प्रमाणे निश्चयनयना आभाससहित एकांतपक्षधारी जैनाभासोना मिथ्यात्वनुं
निरूपण कर्युं.
केवळ व्यवहारावलंबी जैनाभासोनुं निरुपण
हवे व्यवहाराभास पक्षना धारक जैनाभासोना मिथ्यात्वनुं निरूपण करीए छीए.
जिनागममां ज्यां व्यवहारनी मुख्यताथी उपदेश छे, तेने मानी जे बाह्यसाधनादिकनुं
ज श्रद्धानादिक करे छे, तेने धर्मनां सर्व अंग अन्यथारूप थई मिथ्याभावने प्राप्त थाय छे
ते विस्तारथी कहे छे.
अहीं एम जाणवुं केव्यवहारधर्मनी प्रवृत्तिथी पुण्यबंध थाय छे माटे पापप्रवृत्तिनी
अपेक्षाए तो तेनो निषेध नथी, पण जे जीव व्यवहारप्रवृत्ति वडे ज संतुष्ट थाय छे अने
साचा मोक्षमार्गमां उद्यमी थतो नथी, तेने मोक्षमार्गमां सन्मुख करवा माटे ते शुभरूप
प्रवृत्तिनो पण निषेध निरूपण करीए छीए.
आ कथनने सांभळीने जो शुभप्रवृत्ति छोडी अशुभमां प्रवर्तशो तो तमारुं बूरुं थशे,
अने जो यथार्थ श्रद्धान करी मोक्षमार्गमां प्रवर्तशो तो तमारुं भलुं थशे. जेम कोई रोगी निर्गुण
औषधिनो निषेध सांभळी औषधिसाधन छोडी जो कुपथ्यसेवन करे तो ते मरे छे, तेमां वैद्यनो
कांई दोष नथी; तेम कोई संसारी पुण्यरूप धर्मनो निषेध सांभळी धर्मसाधन छोडी
विषयकषायरूप प्रवर्त्तशे, तो ते नरकादिक दुःखने पामशे; तेमां उपदेशदातानो तो दोष नथी.
उपदेश आपवावाळानो अभिप्राय तो असत्य श्रद्धानादिक छोडावी मोक्षमार्गमां लगाववानो
ज जाणवो.
एवा अभिप्रायथी अहीं निरूपण करीए छीए.
कुळ अपेक्षा धार्मधाारक व्यवहाराभासी
कोई जीव तो कुळक्रमवडे ज जैनी छे पण जैनधर्मनुं स्वरूप जाणता नथी, मात्र कुळमां
जेवी प्रवृत्ति चालती आवे छे ते ज प्रमाणे प्रवर्ते छे. त्यां जेम अन्यमती पोताना कुळधर्ममां
प्रवर्ते छे ते ज प्रमाणे आ पण प्रवर्ते छे. जो कुळक्रमथी ज धर्म होय तो मुसलमानादि सर्व
धर्मात्मा ज ठरे, अने तो पछी जैनधर्मनुं विशेषपणुं शुं रह्युं?