सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २१९
कह्युं छे के —
लोयम्मि रायणीई णायं ण कुलकम्म कइयावि ।
किं पुण तिलोयपहुणो जिणंदधम्मादिगारम्मि ।।
(उप सि. २. माळा, गा. ७)
अर्थः — लोकमां एवी राजनीति छे के – कुळक्रमवडे कदी तेनो न्याय थतो नथी. जेनुं
कुळ चोर छे, तेने चोरी करतां पकडी ले तो तेनो कुळक्रम छे एम मानीने छोडता नथी पण
दंड ज आपे छे, तो त्रिलोकप्रभु जिनेन्द्रदेवना धर्माधिकारमां शुं कुळक्रमानुसार न्याय संभवे छे?
वळी जो पिता दरिद्री होय अने पोते धनवान थाय तो त्यां कुळक्रम विचारी पोते
दरिद्री रहेतो ज नथी, तो धर्ममां कुळनुं शुं प्रयोजन छे? पिता नरकमां जाय अने पुत्र मोक्ष
जाय छे त्यां कुळक्रम कयां रह्यो? जो कुळ उपर ज द्रष्टि होय तो पुत्र पण नरकगामी थवो
जोईए, माटे धर्ममां कुळक्रमनुं कांईपण प्रयोजन नथी.
शास्त्रोना अर्थने विचारीने जो काळदोषथी जैनधर्ममां पण पापी पुरुषोए कुदेव – कुगुरु –
कुधर्म सेवनादिरूप तथा विषय – कषाय पोषणादिरूप विपरीत प्रवृत्ति चलावी होय तो तेनो त्याग
करी जिनआज्ञानुसार प्रवर्तवुं योग्य छे.
प्रश्नः — परंपरा छोडी नवीन मार्गमां प्रवर्तवुं योग्य नथी?
उत्तरः — जो पोतानी बुद्धिथी नवीन मार्ग पकडे तो योग्य नथी. जे परंपरा
अनादिनिधन जैनधर्मनुं स्वरूप शास्त्रोमां प्ररूपण कर्युं छे, तेनी प्रवृत्ति छोडी वच्चे कोई पापी
पुरुषोए अन्यथा प्रवृत्ति चलावी होय, तेने परंपरा मार्ग केवी रीते कहेवाय? तथा तेने छोडी
पुरातन जैनशास्त्रोमां जेवो धर्म प्ररूप्यो हतो तेम प्रवर्त्ते तो तेने नवीन मार्ग केम कहेवाय?
बीजुं, कुळमां जेवी जिनदेवनी आज्ञा छे तेवी ज धर्मनी प्रवृति होय तो पोते पण
ते ज प्रमाणे प्रवर्तवुं योग्य छे, परंतु तेने कुळाचरण न जाणी, धर्म जाणी तेना स्वरूप –
फळादिनो निश्चय करी अंगीकार करवो. जे साचा धर्मने पण कुळाचार जाणी प्रवर्ते छे तेने
धर्मात्मा कही शकाय नहि, कारण के – कुळना सर्व ते आचरणने छोडे तो पोते पण छोडी देशे.
वळी ते जे आचरण करे छे ते कुळना भयथी करे छे, पण कांई धर्मबुद्धिथी करतो नथी,
माटे ते धर्मात्मा नथी.
तेथी कुळसंबंधी विवाहादिक कार्योमां तो कुळक्रमनो विचार करवो, पण धर्म-
संबंधी कार्योमां कुळनो विचार न करवो, परंतु जेम सत्यधर्ममार्ग छे तेम ज प्रवर्तवुं
योग्य छे.