Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Pariksharahit Agnyanusari Dharmadharak Vyavharabhasi.

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२२० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
परीक्षारहित आज्ञानुसारी धार्मधाारक व्यवहाराभासी
वळी कोई आज्ञानुसारी जैन थाय छे, तेओ जेम शास्त्रमां आज्ञा छे तेम माने छे,
परंतु आज्ञानी परीक्षा करता नथी; जो आज्ञा ज मानवी धर्म होय तो सर्वमतवाळा पोतपोताना
शास्त्रनी आज्ञा मानी धर्मात्मा थई जाय. माटे परीक्षा करीने जिनवचननुं सत्यपणुं ओळखी
जिनआज्ञा मानवी योग्य छे.
कारण के परीक्षा कर्या विना सत्यअसत्यनो निर्णय केवी रीते थाय? अने निर्णय कर्या
विना जेम अन्यमती पोतपोताना शास्त्रोनी आज्ञा माने छे तेम आणे जैनशास्त्रनी आज्ञा मानी,
ए तो पक्षवडे ज आज्ञा मानवा बराबर छे.
प्रश्नःतो शास्त्रमां दश प्रकारना सम्यक्त्वमां आज्ञासम्यक्त्व कह्युं छे,
आज्ञाविचय धर्मध्याननो भेद कह्यो छे, तथा निःशंकितअंगमां जिनवचनमां संशय
करवानो निषेध कर्यो छे, ते केवी रीते?
उत्तरःशास्त्रमां कोई कथन तो एवां छे के जेनी प्रत्यक्षअनुमानादिवडे परीक्षा
करी शकाय छे, तथा कोई कथन एवां छे के जे प्रत्यक्षअनुमानादिगोचर नथी, तेथी ते
आज्ञावडे ज प्रमाण थाय छे. हवे त्यां जुदाजुदा शास्त्रोमां जे समान कथन होय तेनी तो
परीक्षा करवानुं प्रयोजन ज नथी, पण जे कथनो परस्पर विरुद्ध होय, तेमां जे कथन प्रत्यक्ष
अनुमानादिगोचर होय तेनी तो परीक्षा करवी, तेमां जे शास्त्रना कथननी प्रमाणता ठरे, ते
शास्त्रमां जे प्रत्यक्ष
अनुमानादिगोचर नथी एवां कथन कर्यां होय तेनी पण प्रमाणता करवी,
तथा जे शास्त्रोना कथननी प्रमाणता न ठरे, तेना सर्व कथननी अप्रमाणता मानवी.
प्रश्नःपरीक्षा करतां कोई कथन कोई शास्त्रमां प्रमाण भासे तथा कोई
कथन कोई शास्त्रमां प्रमाण भासे, तो शुं करवुं?
उत्तरःजे आप्तभाषित शास्त्र छे, तेमां तो कोई पण कथन प्रमाणविरुद्ध होय
नहि, कारण केजेनामां कां तो जाणपणुं ज न होय, अगर कां तो रागद्वेष होय, ते ज
असत्य कहे; हवे आप्त एवा होय नहि. तें परीक्षा बराबर करी नथी, माटे भ्रम छे,
प्रश्नःछद्मस्थथी अन्यथा परीक्षा थई जाय तो शुं करवुं?
उत्तरःसत्यअसत्य बंने वस्तुओने कसवामां तथा प्रमाद छोडी परीक्षा करवामां
आवे तो साची ज परीक्षा थाय; पण ज्यां पक्षपातथी बराबर परीक्षा करवामां न आवे, त्यां
ज अन्यथा परीक्षा थाय छे.
प्रश्नःशास्त्रोमां परस्पर विरुद्ध कथन तो घणां छे, तो कोनी कोनी परीक्षा करीए?