Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 263 of 370
PDF/HTML Page 291 of 398

 

background image
परिणाम सुधारवानो उपाय करवो योग्य छे, सर्व प्रकारना मिथ्यात्वभाव छोडी
सम्यग्द्रष्टि थवुं योग्य छे, कारण के संसारनुं मूळ मिथ्यात्व छे, मिथ्यात्व समान
अन्य कोई पाप नथी.
एक मिथ्यात्व अने तेनी साथे अनंतानुबंधी (कषाय)नो अभाव थतां एकतालीस
प्रकृतिओनो बंध तो मटी ज जाय छे, तथा स्थिति अंतःकोडाकोडीसागरनी रही जाय छे अने
अनुभाग थोडो ज रही जाय छे. शीघ्र ज मोक्षपद प्राप्त करे छे; पण मिथ्यात्वनो सद्भाव
रहेतां अनेक उपाय करवा छतां पण मोक्षमार्ग थतो नथी, माटे हरकोई उपायवडे सर्व प्रकारे
मिथ्यात्वनो नाश करवो योग्य छे.
ए प्रमाणे श्री मोक्षमार्गप्रकाशक शास्त्रमां जैनमतवाळा
मिथ्याद्रष्टिओनुं निरूपण करवावाळो सातमो
अधिकार समाप्त
१. ए एकताळीस प्रकृतिओनां नाममिथ्यात्व, हुंडकसंस्थान, नपुंसकवेद, असंप्राप्तासृपाटिका-
संहनन, एकेन्द्रिय, स्थावर, आताप, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण, बेइन्द्रिय, त्रैन्द्रिय, चौरिन्द्रिय, नर्कगति,
नर्कगत्यानुपूर्वि, नर्कायु.
ए सोळ प्रकृतिओना बंधनुं कारण एक मिथ्यात्व ज छे, ते मिथ्यात्वगुणस्थानना
अंतसमयमां ए सोळ प्रकृतिओना बंधनो विच्छेद थाय छे; तथा अनंतानुबंधी कषायना कारणे पचीस
कर्मप्रकृति तेमां
अनंतानुबंधीनी चार, स्त्यानगृद्धिनिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाए त्रण निद्रा, दुर्भग, दुस्वर,
अनादेय, न्यग्रोधपरिमंडलस्वातिकुब्ज अने वामन ए चार संस्थान, वज्रनाराचनाराचअर्धनाराच
अने कीलित ए चार संहनन, अप्रशस्तविहायोगति, स्त्रीवेद, नीचगोत्र, तिर्यंचगति, तिर्यंचानुपूर्वि, तिर्यंचायु
अने उद्योत ए २५ प्रकृतिओनी व्युच्छिति बीजा सासादन गुणस्थानना अंत समयमां थाय छे.
(गोम्मटसार कर्मकांड गाथा. ९५९६)
सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २७३