Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२७२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
छूटी अंतर्मुहूर्तमां केवळज्ञान प्राप्त करे छे. एम जाणी पोताना परिणाम बगाडवानो
भय राखवो तथा तेने सुधारवानो उपाय करवो.
वळी ए सादिमिथ्याद्रष्टिने थोडो काळ मिथ्यात्वनो उदय रहे तो बाह्य जैनीपणुं नष्ट
थतुं नथी, तत्त्वोनुं अश्रद्धान प्रगट थतुं नथी तथा विचार कर्या विना ज या अल्प विचारथी
ज तेने फरी सम्यक्त्वनी प्राप्ति थई जाय छे, तथा जो घणो काळ मिथ्यात्वनो उदय रहे तो
जेवी अनादि मिथ्याद्रष्टिनी दशा होय छे तेवी तेनी पण दशा थई जाय छे, गृहीतमिथ्यात्वने
पण ते ग्रहण करे छे तथा निगोदादिकमां पण रखडे छे, एनुं कांई प्रमाण नथी.
वळी कोई जीव सम्यक्त्वथी भ्रष्ट थई सासादनी थाय छे तो जघन्य एकसमय तथा
उत्कृष्ट छ आवलीप्रमाण काळ रहे छे. तेना परिणामनी दशा वचन द्वारा कही शकाती नथी.
अहीं सूक्ष्मकाळमात्र कोई जातिना केवळज्ञानगम्य परिणाम होय छे, त्यां अनंतानुबंधीनो उदय
तो होय छे पण मिथ्यात्वनो उदय होतो नथी, तेनुं स्वरूप आगमप्रमाणथी जाणवुं.
वळी कोई जीव सम्यक्त्वथी भ्रष्ट थई मिश्रगुणस्थानने प्राप्त थाय छे त्यां
मिश्रमोहनीयनो उदय थाय छे. तेनो काळ मध्यमअंतर्मुहूर्तमात्र छे; तेनो काळ पण थोडो छे
एटले तेना परिणाम पण केवळज्ञानगम्य छे. अहीं एटलुं भासे छे के
जेम कोईने शिक्षा
आपी तेने ते कंईक सत्य अने कंईक असत्य एक काळमां माने छे, तेम आने तत्त्वोनुं श्रद्धान
अश्रद्धान एक काळमां होय छे, ते मिश्रदशा छे.
प्रश्नः‘अमारे तो जिनदेव वा अन्यदेव बधाय वंदन करवा योग्य छे.’
इत्यादि मिश्रश्रद्धानने मिश्रगुणस्थान कहे छे?
उत्तरःना, ए तो प्रत्यक्ष मिथ्यात्वदशा छे; व्यवहाररूप देवादिकनुं श्रद्धान होवा
छतां पण मिथ्यात्व रहे छे त्यारे आने तो देवकुदेवनो कांई निर्णय ज नथी, एटले आने
तो प्रगट विनयमिथ्यात्व छे एम जाणवुं.
ए प्रमाणे सम्यक्त्वसन्मुख मिथ्याद्रष्टिओनुं कथन कर्युं; प्रसंगोपात् अन्य पण कथन
कर्युं.
ए प्रमाणे जैनमतवाळा मिथ्याद्रष्टिओना स्वरूपनुं निरूपण कर्युं.
अहीं नाना प्रकारना मिथ्याद्रष्टिओनुं कथन कर्युं छे तेनुं प्रयोजन ए जाणवुं के
प्रकारोने ओळखी पोतानामां एवा दोष होय तो तेने दूर करी सम्यक्श्रद्धानयुक्त थवुं, पण
अन्यना एवा दोष जोई जोईने कषायी न थवुं. कारण के
पोतानुं भलुंबूरुं तो पोताना
परिणामोथी छे; जो अन्यने रुचिवान देखे तो कंईक उपदेश आपी तेनुं भलुं करे. पोताना