Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २७१
थई हती पण ते शिक्षानो विचार कर्ये घणो काळ थई गयो त्यारे तेने भूली, जेवी पहेलां
अन्यथा प्रतीति हती तेवी ज स्वयं थई गई, त्यारे ते शिक्षानी प्रतीतिनो अभाव थई जाय
छे, अथवा पहेलां तो यथार्थ प्रतीति करी हती, पछी न तो कोई अन्यथा विचार कर्यो के
न घणो काळ गयो परंतु कोई एवा ज कर्मोदयथी होनहार अनुसार स्वयमेव ते प्रतीतिनो
अभाव थई अन्यथापणुं थयुं. ए प्रमाणे अनेक प्रकारथी ते शिक्षानी यथार्थ प्रतीतिनो अभाव
थाय छे; तेम जीवने श्रीजिनदेवनो तत्त्वादिरूप उपदेश थयो, तेनी परीक्षा वडे तेने आ ‘आम
ज छे’ एवुं श्रद्धान थयुं पण पाछळथी पहेलां जेम कह्युं हतुं तेम अनेक प्रकारथी ते
यथार्थश्रद्धाननो अभाव थाय छे. आ कथन स्थूळपणाथी बताव्युं छे परंतु तारतम्यताथी तो
केवळज्ञानमां भासे छे के
‘आ समयमां श्रद्धान छे के आ समयमां नथी,’ कारण केअहीं
(निमित्तमां तो) मूळकारण मिथ्यात्वकर्म छे, तेनो उदय थाय त्यारे तो अन्य विचारादि कारणो
मळो वा न मळो, स्वयमेव सम्यक्श्रद्धाननो अभाव थाय छे, तथा तेनो उदय न होय त्यारे
अन्य कारण मळो वा न मळो, सम्यक्श्रद्धान स्वयमेव थई जाय छे. हवे ए प्रमाणे अंतरंग
समय समय संबंधी सूक्ष्मदशानुं जाणवुं. छद्मस्थने होतुं नथी तेथी तेने पोतानी मिथ्या
सम्यक्श्रद्धारूप अवस्थाना तारतम्यनो निश्चय थई शकतो नथी पण केवळज्ञानमां भासे छे, ए
अपेक्षाए गुणस्थानोनी पलटना शास्त्रमां कही छे.
ए प्रमाणे जे सम्यक्त्वथी भ्रष्ट थाय तेने सादिमिथ्याद्रष्टि कहीए छीए, तेने पण फरी
सम्यक्त्वनी प्राप्तिमां पूर्वोक्त पांच लब्धिओ थाय छे, विशेष एटलुं के अहीं कोई जीवने
दर्शनमोहनी त्रण प्रकृतिओनी सत्ता होय छे ते त्रणेनो उपशम करी ते प्रथमोपशमसम्यक्त्वी
थाय छे, अथवा कोईने सम्यक्मोहनीयनो उदय आवे छे अने बे प्रकृतिओनो उदय थतो नथी
ते क्षयोपशमसम्यक्त्वी थाय छे. तेने गुणश्रेणी आदि क्रिया तथा अनिवृत्तिकरण होतां नथी; कोईने
मिश्रमोहनीयनो उदय आवे छे अने बे प्रकृतिओनो उदय थतो नथी ते मिश्रगुणस्थानने प्राप्त
थाय छे, तेने करण थतां नथी. ए प्रमाणे सादिमिथ्याद्रष्टिने मिथ्यात्व छूटतां दशा थाय छे.
क्षायिकसम्यक्त्वने वेदकसम्यग्द्रष्टि ज पामे छे, तेथी तेनुं कथन अहीं कर्युं नथी. ए प्रमाणे सादि-
मिथ्याद्रष्टिनो जघन्य (काळ) तो मध्यम अंतर्मुहूर्तमात्र तथा उत्कृष्ट किंचित्न्यून अर्धपुद्गल-
परावर्तन मात्र (काळ) जाणवो.
जुओ, परिणामोनी विचित्रता! केकोई जीव तो अगियारमा गुणस्थाने यथाख्यात-
चारित्र पामी पाछो मिथ्याद्रष्टि बनी किंचित्न्यून अर्धपुद्गलपरावर्तनकाळ सुधी संसारमां रखडे
छे, त्यारे कोई जीव नित्यनिगोदमांथी नीकळी मनुष्य थई आठ वर्षनी आयुमां मिथ्यात्वथी
अर्थ :अन्तरकरणका क्या स्वरूप है ? उत्तर :विवक्षितकर्मोंको अधस्तन और उपरिम स्थितियोंको
छोडकर मध्यवर्ती अन्तर्मुहूर्तमात्र स्थितियोंके निषेकोंका परिणाम विशेषके द्वारा अभाव करनेको अन्तरकरण कहते
हैं