अन्यथा प्रतीति हती तेवी ज स्वयं थई गई, त्यारे ते शिक्षानी प्रतीतिनो अभाव थई जाय
छे, अथवा पहेलां तो यथार्थ प्रतीति करी हती, पछी न तो कोई अन्यथा विचार कर्यो के
न घणो काळ गयो परंतु कोई एवा ज कर्मोदयथी होनहार अनुसार स्वयमेव ते प्रतीतिनो
अभाव थई अन्यथापणुं थयुं. ए प्रमाणे अनेक प्रकारथी ते शिक्षानी यथार्थ प्रतीतिनो अभाव
थाय छे; तेम जीवने श्रीजिनदेवनो तत्त्वादिरूप उपदेश थयो, तेनी परीक्षा वडे तेने आ ‘आम
ज छे’ एवुं श्रद्धान थयुं पण पाछळथी पहेलां जेम कह्युं हतुं तेम अनेक प्रकारथी ते
यथार्थश्रद्धाननो अभाव थाय छे. आ कथन स्थूळपणाथी बताव्युं छे परंतु तारतम्यताथी तो
केवळज्ञानमां भासे छे के
मळो वा न मळो, स्वयमेव सम्यक्श्रद्धाननो अभाव थाय छे, तथा तेनो उदय न होय त्यारे
अन्य कारण मळो वा न मळो, सम्यक्श्रद्धान स्वयमेव थई जाय छे. हवे ए प्रमाणे अंतरंग
समय समय संबंधी सूक्ष्मदशानुं जाणवुं. छद्मस्थने होतुं नथी तेथी तेने पोतानी मिथ्या
अपेक्षाए गुणस्थानोनी पलटना शास्त्रमां कही छे.
दर्शनमोहनी त्रण प्रकृतिओनी सत्ता होय छे ते त्रणेनो उपशम करी ते प्रथमोपशमसम्यक्त्वी
थाय छे, अथवा कोईने सम्यक्मोहनीयनो उदय आवे छे अने बे प्रकृतिओनो उदय थतो नथी
ते क्षयोपशमसम्यक्त्वी थाय छे. तेने गुणश्रेणी आदि क्रिया तथा अनिवृत्तिकरण होतां नथी; कोईने
मिश्रमोहनीयनो उदय आवे छे अने बे प्रकृतिओनो उदय थतो नथी ते मिश्रगुणस्थानने प्राप्त
थाय छे, तेने करण थतां नथी. ए प्रमाणे सादिमिथ्याद्रष्टिने मिथ्यात्व छूटतां दशा थाय छे.
क्षायिकसम्यक्त्वने वेदकसम्यग्द्रष्टि ज पामे छे, तेथी तेनुं कथन अहीं कर्युं नथी. ए प्रमाणे सादि-
मिथ्याद्रष्टिनो जघन्य (काळ) तो मध्यम अंतर्मुहूर्तमात्र तथा उत्कृष्ट किंचित्न्यून अर्धपुद्गल-
परावर्तन मात्र (काळ) जाणवो.
छे, त्यारे कोई जीव नित्यनिगोदमांथी नीकळी मनुष्य थई आठ वर्षनी आयुमां मिथ्यात्वथी
हैं