२७० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
१ – समये समये अनंतगुणी विशुद्धता थाय, २ – नवीनबंधनी स्थिति एक एक अंतर्मुहूर्तथी
घटती जाय छे ते स्थितिबंधापसरण छे. ३ – समये समये प्रशस्त प्रकृतिओनो अनुभाग
अनंतगुणो वधे, ४ – समये समये अप्रशस्त प्रकृतिओनो अनुभागबंध अनंतमा भागे थाय —
ए प्रमाणे चार आवश्यक थाय छे.
ते पछी अपूर्वकरण थाय छे, तेनो काळ अधःकरणना काळना संख्यातमा भाग छे.
तेमां आ आवश्यक बीजा थाय छे. (१) सत्ताभूत पूर्वकर्मनी स्थितिने एक एक अंतर्मुहूर्तथी
घटाडे तेवो स्थितिकांडकघात थाय, (२) तेनाथी अल्प एक एक अंतर्मुहूर्तथी पूर्वकर्मना
अनुभागने घटाडे तेवो अनुभागकांडकघात थाय, (३) गुणश्रेणिना काळमां क्रमथी असंख्यात-
गुणा प्रमाणसहित कर्म, निर्जरवा योग्य करे तेवी गुणश्रेणि निर्जरा थाय, तथा गुणसंक्रमण
अहीं थतुं नथी पण अन्यत्र अपूर्वकरण थाय छे त्यां थाय छे.
ए प्रमाणे अपूर्वकरण थया पछी अनिवृत्तिकरण थाय छे तेनो काळ अपूर्वकरणना पण
संख्यातमा भाग छे, तेमां पूर्वोक्त आवश्यकसहित केटलोक काळ गया पछी १अंतरकरण करे
छे, जे अनिवृत्तिकरणना काळ पछी उदय आववा योग्य एवां मिथ्यात्वकर्मनां मुहूर्तमात्र
निषेकोनो अभाव करे छे; अने ते परमाणुओने अन्य स्थितिरूप परिणमावे छे. (तेने
अंतरकरण कहेवाय छे.) ते अंतरकरण पछी उपशमकरण करे छे, अर्थात् अंतःकरण वडे
अभावरूप करेला निषेकोना उपरना जे मिथ्यात्वना निषेक छे तेने उदय आववाने अयोग्य
करे छे, इत्यादि क्रियावडे अनिवृत्तिकरणना अंतसमयना अनंतर जे निषेकोनो अभाव कर्यो हतो
तेनो उदय काळ आवतां ते काळे निषेको विना उदय कोनो आवे? तेथी मिथ्यात्वनो उदय न
होवाथी प्रथमोपशमसम्यक्त्वनी प्राप्ति थाय छे. अनादि मिथ्याद्रष्टिने सम्यक्त्वमोहनीय अने
मिश्रमोहनीयनी सत्ता नथी तेथी ते एक मिथ्यात्वकर्मनो ज उपशम करी उपशमसम्यग्द्रष्टि थाय
छे, तथा कोई जीव सम्यक्त्व पामी पछी भ्रष्ट थाय छे तेनी दशा पण अनादि मिथ्याद्रष्टि
जेवी थई जाय छे.
प्रश्नः – प्रथम परीक्षावडे तत्त्वश्रद्धान कर्युं हतुं छतां तेनो अभाव केवी रीते थाय?
उत्तरः — जेम कोई पुरुषने शिक्षा आपी. तेनी परीक्षा वडे तेने ‘आम ज छे’ एवी
प्रतीति पण आवी हती, पछी कोई प्रकारे अन्यथा विचार थयो. तेथी ए शिक्षामां तेने संदेह
थयो के – ‘आम छे के आम छे?’ अथवा ‘न मालूम केम हशे?’ अथवा ते शिक्षाने जूठ जाणी
तेनाथी विपरीतता थई त्यारे तेने अप्रतीति थई अने तेथी ते शिक्षानी प्रतीतिनो तेने अभाव
थयो. अथवा पहेलां तो अन्यथा प्रतीति हती ज, वचमां शिक्षाना विचारथी यथार्थ प्रतीति
१.किमंतरकरणं णाम ? विवक्खियकम्माणं हेट्ठिमोवरिमट्ठिदीओ मोत्तूण मज्झे अन्तोमुहुत्तमेत्ताणं ट्ठिदीणं परिणाम-
विसेसेण णिसेगाणमभावीकरण मंतरकरणमिदि भण्णदे ।।(जयधवला, अ० प० ९५३)