Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Karananuyoganu Prayojan.

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आठमो अधिकार ][ २७५
ए प्रमाणे तुच्छबुद्धिवानोने समजाववा माटे आ अनुयोग छे. ‘प्रथम’ अर्थात्
‘अव्युत्पन्न-मिथ्याद्रष्टि’ तेमना माटे जे अनुयोग छे ते प्रथमानुयोग छे, एवो अर्थ
गोम्मटसारनी टीकामां कर्यो छे.
वळी जे जीवोने तत्त्वज्ञान थयुं होय पछी तेओ आ प्रथमानुयोग वांचेसांभळे तो तेमने
आ तेना उदाहरणरूप भासे छे; जेम केजीव अनादिनिधन छे, शरीरादि संयोगी पदार्थ छे,
एम आ जाणतो हतो, हवे पुराणादिकमां जीवोनां भवांतरोनुं निरूपण कर्युं छे ते ए जाणवामां
उदाहरणरूप थयुं, वळी आ शुभ
अशुभशुद्धोपयोगने जाणतो हतो, वा तेना फळने जाणतो
हतो, हवे पुराणोमां ते उपयोगनी प्रवृत्ति तथा तेनुं फळ जीवोने जे थयुं होय तेनुं निरूपण कर्युं
छे ए ज आ जाणवामां उदाहरणरूप थयुं ए ज प्रमाणे अन्य पण जाणवुं.
अहीं उदाहरणनो अर्थ ए छे केजेम आ जाणतो हतो तेम ज कोई जीवने अवस्था
थई तेथी ते आना जाणवामां साक्षी थई.
वळी जेम कोई सुभट छे ते सुभटोनी प्रशंसा अने कायरोनी निंदा जेमां होय एवी
कोई पुराणपुरुषोनी कथा सांभळवाथी सुभटतामां अति उत्साहवान थाय छे, तेम धर्मात्मा छे
ते धर्मीओनी प्रशंसा अने पापीओनी निंदा जेमां होय एवी कोई पुराणपुरुषोनी कथा
सांभळवाथी धर्ममां अति उत्साहवान थाय छे.
ए प्रमाणे आ प्रथमानुयोगनुं प्रयोजन जाणवुं.
करणानुयोगनुं प्रयोजन
करणानुयोगमां जीवोनी वा कर्मोनी विशेषता तथा त्रिलोकादिकनी रचना निरूपण करी
जीवोने धर्ममां लगाव्या छे. जे जीव धर्ममां उपयोग लगाववा इच्छे छे ते जीवोना गुणस्थान
मार्गणादि भेद तथा कर्मोनां कारणअवस्थाफळ कोने कोने केवी रीते होय छे. इत्यादि भेद
तथा त्रणलोकमां नर्कस्वर्गादिनां ठेकाणां ओळखी पापथी विमुख थई धर्ममां लागे छे. वळी
जो एवा विचारमां उपयोग रमी जाय तो पापप्रवृत्ति छूटी स्वयं तत्काळ धर्म ऊपजे छे, तथा
तेना अभ्यासथी तत्त्वज्ञाननी पण प्राप्ति शीघ्र थाय छे. वळी आवुं सूक्ष्म अने यथार्थ कथन
जैनमतमां ज छे, अन्य ठेकाणे नथी
एवो तेनो महिमा जाणी ते जैनमतनो श्रद्धानी थाय छे.
बीजुं, जे जीव तत्त्वज्ञानी थईने आ करणानुयोगनो अभ्यास करे तेने आ तेना
१. प्रथमानुयोगः प्रथमं मिथ्यादृष्टिमव्रतिकमव्युत्पन्नं वा प्रतिपाद्यमाश्रित्य प्रवृत्तोऽनुयोगोऽधिकारः प्रथमानुयोगः।
अर्थःप्रथम अर्थात् मिथ्याद्रष्टिअव्रती विशेषज्ञानरहितने उपदेश आपवा अर्थे जे प्रवृत्त थयेलो अधिकार
अर्थात् अनुयोग तेने प्रथमानुयोग कहे छे.
(गोम्मटसार जीवकांड गाथा ३६१३६२ नी टीका.)अनुवादक.