Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Charananuyoganu Prayojan.

< Previous Page   Next Page >


Page 266 of 370
PDF/HTML Page 294 of 398

 

background image
२७६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
विशेषणरूप भासे छे. जेम जीवादिक तत्त्वोने पोते जाणे छे, हवे तेना ज विशेष (भेद)
करणानुयोगमां कर्या छे, तेमां केटलांक विशेषण तो यथावत् निश्चयरूप छे तथा केटलांक
उपचारसहित व्यवहाररूप छे, केटलांक द्रव्य
क्षेत्रकाळभावादिकनुं स्वरूप प्रमाणादिरूप छे
तथा केटलांक निमित्तआश्रयादिनी अपेक्षासहित छे; इत्यादि अनेक प्रकारनां विशेषण निरूपण
कर्यां छे, तेने जेम छे तेम मानीने आ करणानुयोगनो अभ्यास करे छे.
ए अभ्यासथी तत्त्वज्ञान निर्मळ थाय छे. जेम कोई एम तो जाणतो हतो के ‘आ
रत्न छे,’ परंतु ए रत्नोना घणा विशेषण (भेदो) जाणतां ते निर्मळ रत्ननो परीक्षक थाय
छे, तेम आ तत्त्वोने जाणतो तो हतो के ‘आ जीवादिक छे,’ परंतु ए तत्त्वोना घणा भेदो
जाणे तो तेने तत्त्वज्ञान निर्मळ थाय छे, अने तत्त्वज्ञान निर्मळ थतां पोते ज विशेष धर्मात्मा
थाय छे.
वळी अन्य ठेकाणे उपयोगने लगावे तो रागादिकनी वृद्धि थाय छे अने छद्मस्थनो
उपयोग निरंतर एकाग्र रहे नहि, माटे ज्ञानी आ करणानुयोगना अभ्यासमां पोताना
उपयोगने लगावे छे, जे वडे केवळज्ञानवडे देखेला पदार्थोनुं जाणपणुं तेने थाय छे. भेदमात्र
त्यां प्रत्यक्ष
अप्रत्यक्षनो ज छे पण भासवामां विरुद्धता नथी.
ए प्रमाणे आ करणानुयोगनुं प्रयोजन जाणवुं.
‘करण’ एटले गणितकार्यना कारणरूप जे सूत्र, तेनो जेमां ‘अनुयोग’ अर्थात् अधिकार
होय ते करणानुयोग छे. आ अनुयोगमां गणितवर्णननी मुख्यता छे. एम समजवुं.
चरणानुयोगनुं प्रयोजन
चरणानुयोगमां नानाप्रकारनां धर्मसाधन निरूपण करी जीवोने धर्ममां लगावीए छीए.
जे जीव हितअहितने जाणतो नथी अने हिंसादि पापकार्योमां तत्पर थई रह्यो छे, तेने जेम
ते पापकार्योने छोडी धर्मकार्यमां जोडाय तेम अहीं उपदेश आप्यो छे. तेने जाणी जिनधर्माचरण
करवाने सन्मुख थतां ते जीव गृहस्थ
मुनिधर्मनुं विधान सांभळी पोतानाथी जेवो धर्म सधाय
तेवा धर्मसाधनमां लागे छे.
एवा साधनथी कषाय मंद थाय छे अने तेना फळमां एटलुं तो थाय छे के ते कुगतिनां
दुःख न पामतां सुगतिनां सुख प्राप्त करे छे. वळी एवा साधनथी जैनमतनां निमित्त बन्यां
रहे छे. त्यां तत्त्वज्ञाननी प्राप्ति थवानी होय तो थई जाय.
बीजुं, जे जीव तत्त्वज्ञानी थई चरणानुयोगनो अभ्यास करे छे तेने ए बधां आचरण
पोताना वीतरागभाव अनुसार भासे छे. एकदेशवा सर्वदेश वीतरागता थतां एवी
श्रावकदशामुनिदशा थाय छे, कारण के (ए एकदेश
सर्वदेश वीतरागता अने आ श्रावक