Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Dravyanuyoganu Prayojan Prathmanuyogama Vyakhyananu Vidhan.

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आठमो अधिकार ][ २७७
मुनिदशाने) तेने निमित्त-नैमित्तिकपणुं होय छे, एम जाणी श्रावकमुनिधर्मना भेदोने ओळखी
जेवो पोताने वीतरागभाव थयो होय तेवो पोताने योग्य धर्म साधे छे. त्यां जेटला अंशे
वीतरागता होय छे तेने कार्यकारी जाणे छे. जेटला अंशे राग रहे छे तेने हेय जाणे छे
तथा संपूर्ण वीतरागताने परमधर्म माने छे.
ए प्रमाणे चरणानुयोगनुं प्रयोजन छे.
द्रव्यानुयोगनुं प्रयोजन
द्रव्यानुयोगमां द्रव्योना अने तत्त्वोना निरूपण वडे जीवोने धर्ममां लगावीए छीए. जे
जीव, जीवअजीवादि द्रव्योने वा तत्त्वोने ओळखतो नथी तथा स्वपरने भिन्न जाणतो नथी
तेने हेतुद्रष्टांतयुक्तिद्वारा अने प्रमाणनयादिवडे तेनुं स्वरूप ए प्रमाणे बताव्युं छे के जेथी
तेने तेनी प्रतीति थई जाय; अने तेना अभ्यासथी अनादि अज्ञानता दूर थाय छे. अन्यमतनां
कल्पित तत्त्वादिक जूठां भासे त्यारे जैनमतनी प्रतीति थाय, तथा जो तेना भावने ओळखवानो
अभ्यास राखे तो तेने तुरत ज तत्त्वज्ञाननी प्राप्ति थई जाय.
वळी जेने तत्त्वज्ञान थयुं होय ते जीव द्रव्यानुयोगनो अभ्यास करे तो तेने पोताना
श्रद्धानानुसार ए बधां कथन प्रतिभासे छे. जेम कोईए कोई विद्या शीखी लीधी होय पण
जो ते तेनो अभ्यास राख्या करे तो ते याद रहे, न राखे तो भूली जाय; तेम आने तत्त्वज्ञान
तो थयुं छे परंतु जो तेना प्रतिपादक द्रव्यानुयोगनो अभ्यास कर्या करे तो ते तत्त्वज्ञान टकी
रहे, न करे तो भूली जाय. अथवा संक्षेपताथी तत्त्वज्ञान थयुं हतुं ते अहीं नाना युक्ति
हेतुद्रष्टांतादिवडे स्पष्ट थई जाय तो पछी तेमां शिथिलता थई शके नहि अने तेना अभ्यासथी
रागादिक घटवाथी अल्पकाळमां मोक्ष सधाय छे.
ए प्रमाणे द्रव्यानुयोगनुं प्रयोजन जाणवुं.
हवे ए अनुयोगोमां केवा प्रकारथी व्याख्यान छे ते अहीं कहीए छीए
प्रथमानुयोगमां व्याख्याननुं विधाान
प्रथमानुयोगमां जे मूळकथाओ छे ते तो जेवी छे तेवी ज निरूपवामां आवे छे तथा
तेमां प्रसंगोपात् जे व्याख्यान होय छे ते कोई तो जेवुं ने तेवुं होय छे तथा कोई ग्रंथकर्ताना
विचारानुसार होय छे, परंतु त्यां प्रयोजन अन्यथा होतुं नथी.
उदाहरणजेम, तीर्थंकरदेवोना कल्याणकोमां इन्द्रो आव्या ए कथा तो सत्य छे. परंतु
त्यां इन्द्रे स्तुति करी तेनुं जे अहीं व्याख्यान कर्युं, त्यां इन्द्रे तो अन्यप्रकारथी ज स्तुति करी
हती अने अहीं ग्रंथकर्ताए अन्यप्रकारथी ज स्तुति करवी लखी, परंतु स्तुतिरूप प्रयोजन