Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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नवमो अधिकार ][ ३११
संकोचविस्तारादि अवस्था जेवी थाय तेवी थाओ, तेने स्ववशपणाथी पण भोगवे छे, त्यां
स्वभावमां तर्क नथी, आत्मानो एवो ज स्वभाव छे एम समजवुं.
जुओ! दुःखी थाय त्यारे सूवा इच्छे छे, जोके सूवामां ज्ञानादिक मंद थई जाय छे
परंतु जड जेवो बनीने पण दुःखने दूर करवा इच्छे छे वा मरवा इच्छे छे; हवे मरवामां
पोतानो नाश माने छे परंतु पोतानुं अस्तित्व गुमावीने पण दुःख दूर करवा इच्छे छे. माटे
एक दुःखरूप पर्यायनो अभाव करवो ए ज तेनुं कर्तव्य छे.
हवे दुःख न थाय ए ज सुख छे. कारण केआकुळतालक्षण सहित दुःख छे, तेनो
जे अभाव थवो ए ज निराकुळलक्षण सुख छे. अने ए पण प्रत्यक्ष जणाय छे केबाह्य कोई
पण सामग्रीनो संयोग मळतां जेना अंतरंगमां आकुळता छे ते दुःखी ज छे तथा जेने आकुळता
नथी ते सुखी छे. वळी आकुळता थाय छे ते रागादिक कषायभाव थतां थाय छे, कारण के
रागादिभावो वडे आ जीव तो द्रव्योने अन्य प्रकारे परिणमाववा इच्छे छे अने ते द्रव्यो अन्य
प्रकारे परिणमे छे त्यारे आने आकुळता थाय छे. हवे कां तो पोताने रागादिभाव दूर थाय
अथवा पोतानी इच्छानुसार ज सर्व द्रव्यो परिणमे तो आकुळता मटे, परंतु सर्व द्रव्यो तो
आने आधीन नथी. कोई वेळा कोई द्रव्य जेवी आनी इच्छा होय तेम ज परिणमे तोपण
आनी आकुळता सर्वथा दूर थती नथी. सर्व कार्य आनी इच्छानुसार ज थाय, अन्यथा न थाय
त्यारे ज आ निराकुळ रहे; पण एम तो थई ज शकतुं नथी.
कारण केकोई द्रव्यनुं
परिणमन कोई द्रव्यने आधीन नथी माटे पोताना रागादिभाव दूर थतां निराकुळता
थाय छे, अने ते कार्य बनी शके एम छे.
कारण के रागादिभावो आत्माना स्वभावभाव
तो छे नहि पण औपाधिकभाव छे, परनिमित्तथी थया छे अने एमां निमित्त मोहकर्मनो उदय
छे, तेनो अभाव थतां सर्व रागादिभाव नाश पामी जाय त्यारे आकुळतानो नाश थतां दुःख
दूर थई सुखनी प्राप्ति थाय छे. माटे मोहकर्मनो नाश हितकारी छे.
वळी ते आकुळताने सहकारी कारण ज्ञानावरणादिकनो उदय छे, ज्ञानावरण
दर्शनावरणना उदयथी ज्ञानदर्शन संपूर्ण प्रगट थतां नथी अने तेथी आने देखवाजाणवानी
आकुळता थाय छे; अथवा वस्तुनो स्वभाव यथार्थ संपूर्ण जाणी शकतो नथी त्यारे रागादिरूप
थई प्रवर्ते छे त्यां आकुळता थाय छे.
वळी अंतरायना उदयथी इच्छानुसार दानादि कार्य न बने त्यारे आकुळता थाय छे,
एनो उदय छे ते मोहनो उदय थतां आकुळताने सहकारी कारण छे. मोहना उदयनो नाश
थतां एनुं बळ नथी, अंतर्मुहूर्तमां आपोआप ते नाश पामे छे. अने सहकारी कारण पण
दूर थई जाय त्यारे प्रगटरूप निराकुळदशा भासे त्यां केवळज्ञानी भगवान अनंतसुखरूप दशाने
प्राप्त कहीए छीए.