थाय अने बाह्य अघातिकर्मोना उदयथी रागादिकनुं कारण शरीरादिनो संयोग थाय त्यारे
आकुळता ऊपजे छे. मोहनो उदय नाश थवा छतां पण अघातिकर्मोनो उदय रहे छे पण
ते कांईपण आकुळता उपजावी शकतो नथी, परंतु पूर्वे आकुळताने सहकारी कारणरूप हतो
माटे ए अघातिकर्मोनो नाश पण आत्माने इष्ट ज छे. केवळीभगवानने एना होवा छतां
पण कांई दुःख नथी माटे तेना नाशनो उद्यम पण नथी. परंतु मोहनो नाश थतां ए सर्व
कर्मो आपोआप थोडा ज काळमां नाशने प्राप्त थई जाय छे.
हतुं वा अन्य जीवोने घणुं दुःख होय छे ए अपेक्षाए थोडा दुःखवाळाने सुखी कहीए छीए,
तथा ए ज अभिप्रायथी थोडा दुःखवाळो पोताने सुखी माने छे, पण वस्तुताए तेने सुख
नथी. वळी ए थोडुं दुःख पण जो सदाकाळ रहे तो तेने पण हितरूप ठरावीए परंतु तेम
पण नथी. पुण्यनो उदय थोडो काळ ज रहे छे अने त्यां सुधी ज थोडुं दुःख थाय छे पण
पाछळथी घणुं दुःख थई जाय छे. माटे संसारअवस्था हितरूप नथी.
छे; परंतु परमार्थथी ज्यांसुधी ज्वरनो सद्भाव छे त्यांसुधी तेने ठीक नथी; तेम संसारी जीवने
मोहनो उदय छे तेने कोई वेळा घणी आकुळता थाय छे तथा कोई वेळा थोडी थाय छे; थोडी
आकुळता होय त्यारे ते पोताने सुखी माने छे, लोक पण कहे छे के सुखी छे; परंतु परमार्थथी
ज्यांसुधी मोहनो सद्भाव छे त्यांसुधी सुख नथी.