Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Sansarik Sukh Dukha J Chhe.

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३१२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
अघातिकर्मोना उदयना निमित्तथी शरीरादिकनो संयोग थाय छे, मोहकर्मनो उदय थतां
शरीरादिकनो संयोग आकुळताने बाह्य सहकारी कारण छे. अंतरंग मोहना उदयथी रागादिक
थाय अने बाह्य अघातिकर्मोना उदयथी रागादिकनुं कारण शरीरादिनो संयोग थाय त्यारे
आकुळता ऊपजे छे. मोहनो उदय नाश थवा छतां पण अघातिकर्मोनो उदय रहे छे पण
ते कांईपण आकुळता उपजावी शकतो नथी, परंतु पूर्वे आकुळताने सहकारी कारणरूप हतो
माटे ए अघातिकर्मोनो नाश पण आत्माने इष्ट ज छे. केवळीभगवानने एना होवा छतां
पण कांई दुःख नथी माटे तेना नाशनो उद्यम पण नथी. परंतु मोहनो नाश थतां ए सर्व
कर्मो आपोआप थोडा ज काळमां नाशने प्राप्त थई जाय छे.
ए प्रमाणे सर्व कर्मोनो नाश थवो ए आत्मानुं हित छे. अने सर्व कर्मोना नाशनुं
ज नाम मोक्ष छे माटे आत्मानुं हित एक मोक्ष ज छे, अन्य कांई नथी, एवो निश्चय करवो.
प्रश्नःसंसारदशामां पुण्यकर्मनो उदय थतां जीव सुखी पण थाय छे, तो
‘केवळ मोक्ष ज हित छे’ एम शा माटे कहो छो?
सांसारिक सुख दुःख ज छे
उत्तरःसंसारदशामां सुख तो सर्वथा छे ज नहि, दुःख ज छे; परंतु कोईने कोई
वेळा घणुं दुःख होय छे तथा कोईने कोई वेळा थोडुं दुःख होय छे. हवे पूर्वे घणुं दुःख
हतुं वा अन्य जीवोने घणुं दुःख होय छे ए अपेक्षाए थोडा दुःखवाळाने सुखी कहीए छीए,
तथा ए ज अभिप्रायथी थोडा दुःखवाळो पोताने सुखी माने छे, पण वस्तुताए तेने सुख
नथी. वळी ए थोडुं दुःख पण जो सदाकाळ रहे तो तेने पण हितरूप ठरावीए परंतु तेम
पण नथी. पुण्यनो उदय थोडो काळ ज रहे छे अने त्यां सुधी ज थोडुं दुःख थाय छे पण
पाछळथी घणुं दुःख थई जाय छे. माटे संसारअवस्था हितरूप नथी.
जेम कोईने विषमज्वर छे तेने कोई वेळा घणी अशाता थाय छे तथा कोई वेळा
थोडी थाय छे, थोडी अशाता होय त्यारे ते पोताने ठीक माने छे; लोक पण कहे छे के ठीक
छे; परंतु परमार्थथी ज्यांसुधी ज्वरनो सद्भाव छे त्यांसुधी तेने ठीक नथी; तेम संसारी जीवने
मोहनो उदय छे तेने कोई वेळा घणी आकुळता थाय छे तथा कोई वेळा थोडी थाय छे; थोडी
आकुळता होय त्यारे ते पोताने सुखी माने छे, लोक पण कहे छे के सुखी छे; परंतु परमार्थथी
ज्यांसुधी मोहनो सद्भाव छे त्यांसुधी सुख नथी.
तथा सांभळो, संसारदशामां पण आकुळता घटतां सुख नाम पामे छे तथा आकुळता
वधतां दुःख नाम पामे छे, क्यांय बाह्य सामग्रीथी सुखदुःख नथी. जेम कोई दरिद्रीने किंचित्
धननी प्राप्ति थई, त्यां कंईक आकुळता घटवाथी तेने सुखी कहीए छीए अने ते पण पोताने