Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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नवमो अधिकार ][ ३१३
सुखी माने छे, तथा कोई घणा धनवानने किंचित् धननी हानि थई त्यां कंईक आकुळता
वधवाथी तेने दुःखी कहीए छीए अने ते पण पोताने दुःखी माने छे.
ए ज प्रमाणे सर्वत्र जाणवुं.
वळी ए आकुळतानुं घटवुंवधवुं पण बाह्यसामग्री अनुसार नथी पण कषायभावो
घटवावधवाना अनुसारे छे. जेम कोईने थोडुं धन छे पण जो संतोष छे तो तेने आकुळता
घणी थोडी छे, तथा कोईने घणुं धन छे पण तृष्णा छे तो तेने आकुळता घणी छे. बीजुं
कोईने कोईए बूरुं कह्युं, अने जो तेने थोडो पण क्रोध न थाय तो तेने आकुळता थती नथी
तथा जेने थोडी वातो कहेतां ज घणो क्रोध थई आवे तो तेने आकुळता घणी थाय छे. वळी
जेम गायने वाछरडाथी कांई पण प्रयोजन नथी परंतु मोह घणो होवाथी तेनी रक्षा करवानी
तेने घणी आकुळता होय छे, त्यारे सुभटने शरीरादिकथी घणां कार्य सधाय छे परंतु रणक्षेत्रमां
मानादिना कारणे शरीरादिकथी मोह घटी जतां मरणनी पण तेने थोडी आकुळता थाय छे. माटे
एम जाणवुं के
संसारअवस्थामां पण आकुळता घटवावधवाथी ज सुखदुःख मानवामां
आवे छे, अने आकुळतानुं घटवुंवधवुं रागादि कषायो घटवावधवाना अनुसारे छे.
वळी परद्रव्यरूप बाह्यसामग्री अनुसार सुखदुःख नथी. कषायथी इच्छा उत्पन्न
थाय तथा तेनी इच्छानुसार बाह्यसामग्री मळे अने ते काळे तेने कंईक कषायनुं उपशमन
थवाथी आकुळता घटे त्यारे सुख माने छे, तथा इच्छानुसार सामग्री न मळे त्यारे कषाय
वधवाथी आकुळता वधे छे अने दुःख माने छे. हवे छे तो आ प्रमाणे, पण आ एवुं
जाणे छे के
मने परद्रव्यना निमित्तथी सुखदुःख थाय छे; पण एम जाणवुं ए भ्रम ज
छे. माटे अहीं आवो विचार करवो केसंसारअवस्थामां किंचित् कषाय घटवाथी सुख माने
छे अने तेने हितरूप जाणे छे, तो ज्यां सर्वथा कषाय दूर थतां वा कषायनां कारणो दूर
थतां परम निराकुळता थवाथी अनंतसुख प्राप्त थाय छे
एवी मोक्ष अवस्थाने हितरूप केम
न माने?
वळी संसारअवस्थामां उच्चपद पामे तोपण कां तो विषयसामग्री मेळववानी आकुळता
थाय छे, कां तो विषयसेवननी आकुळता थाय छे, अगर कां तो पोताने क्रोधादि कषायथी
कोई अन्य इच्छा ऊपजे तेने पूर्ण करवानी आकुळता थाय छे, पण कोई वेळा ते सर्वथा
निराकुळ थई शकतो नथी; अभिप्रायमां तो अनेक प्रकारनी आकुळता बनी ज रहे छे. वळी
कोई आकुळता मटाडवानो बाह्य उपाय करे पण प्रथम तो कार्य सिद्ध थाय नहि, कदाचित्
जो भवितव्ययोगथी ते कार्य सिद्ध थई जाय तो ते ज क्षणे अन्य आकुळता मटाडवाना
उपायमां लागे छे; ए प्रमाणे आकुळता मटाडवानी पण आकुळता निरंतर रह्या करे छे. जो
एवी आकुळता न रहे तो नवा नवा विषयसेवनादि कार्योमां ते शामाटे प्रवर्ते छे? माटे