समाधिमरणनुं स्वरूप ][ ३४५
परिशिष्ट १
समाधिामरणनुं स्वरुप
[ पंडितप्रवर टोडरमलजीना सुपुत्र पंडित गुमानीरामजीए रचेलुं ]
[आचार्य पंडित टोडरमलजीना सहाध्यायी अने धर्मप्रभावनामां उत्साहप्रेरक ब्र.
राजमलजी कृत ‘‘ज्ञानानंद निर्भर निजरस श्रावकाचार’’ नामना ग्रंथमांथी आ अधिकार बहु
सुंदर जाणीने आत्मधर्मना अंक २५३ – ५४मां लीधो हतो. तेमांथी ज शरूआतनो अंश अहीं
आपवामां आवे छे.]
हे भव्य! तुं सांभळ! हवे समाधिमरणनुं लक्षण वर्णववामां आवे छे. समाधिमरण
नाम *निःकषायभावनुं छे, शांत परिणामोनुं छे; भेदविज्ञान सहित, कषायरहित शांति
परिणामपूर्वक मरण थवुं ते समाधिमरण छे. संक्षिप्तपणे समाधिमरणनुं आ ज वर्णन छे.
विशेष कथन आगळ करीए छीए.
सम्यग्ज्ञानी जीवनो ए सहज स्वभाव ज छे के ते समाधिमरणनी ज इच्छा करे
छे, तेने हंमेशां ए ज भावना रहे छे. अंत समये मरण नजदीक आवतां ते एवी रीते
सावधान थाय छे जेम ते सूतेलो सिंह सावधान थाय छे — के जेने कोई मनुष्य पडकारे छे
के, ‘‘हे सिंह! तारा उपर दुश्मनोनी सेना आक्रमणनी तैयारी करी रही छे, तुं पुरुषार्थ कर
अने गुफामांथी बहार नीकळ. ज्यां सुधी दुश्मनोनी सेना दूर छे त्यां सुधीमां तुं तैयार थई
जा अने शत्रुनी सेनाने जीती ले. महान पुरुषोनी ए ज पद्धति छे के ते शत्रुना जागवा
पहेलां ज तैयार रहे छे.’’
ते पुरुषना आवा वचन सांभळीने सिंह तरत ज उठ्यो अने तेणे एवी गर्जना करी
जाणे के अषाढ मासमां मेघराजाए ज गर्जना करी होय.
मृत्युने समीप जाणीने सम्यग्ज्ञानी पुरुष सिंहनी जेम सावधान थाय छे अने
कायरतानो दूरथी ज त्याग करे छे.
सम्यग्द्रष्टि केवो छे?
तेना हृदयमां आत्मानुं स्वरूप देदीप्यमान प्रगटपणे प्रतिभासे छे. ते ज्ञानज्योतिथी
आनंदरसथी परिपूर्ण छे. ते पोताने साक्षात् पुरुषाकार, अमूर्तिक, चैतन्यधातुनो पिंड, अनंत
* क्रोध, मान, माया अने लोभ ए चार कषाय छे.