३४४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
हाथ – पग आदि अंग तो होय छे, परंतु जेवा मनुष्यने होय छे तेवां होतां नथी; तेम
मिथ्याद्रष्टिने पण व्यवहाररूप निःशंकितादि अंगो होय छे, परंतु जेवां निश्चयनी सापेक्षतासहित
सम्यग्द्रष्टिने होय छे तेवां होतां नथी.
सम्यग्दर्शननां २५ दोष
तथा सम्यक्त्वमां पचीस मळ कहे छे — शंकादि आठ दोष, आठ मद, त्रण मूढता
अने छ अनायतन; ए पचीस दोष सम्यग्द्रष्टिने होता नथी. कदाचित् कोईने कंईक मळ लागे
छे पण सम्यक्त्वनो सर्वथा नाश थतो नथी, त्यां सम्यक्त्व मलिन ज थाय छे – एम समजवुं.
वळी......
ए प्रमाणे श्री मोक्षमार्गप्रकाशक नाम शास्त्रमां ‘मोक्षमार्गनुं स्वरूप’
ए नामनो नवमो अधिकार समाप्त
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