Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Parishisht-2 Rahasyapoorn Chiththi (pandit Todarmalji Rachit).

< Previous Page   Next Page >


Page 337 of 370
PDF/HTML Page 365 of 398

 

background image
[ ३४७
परिशिष्ट २
रहस्यपूर्ण चिÕी
(आचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी द्वारा रचित)
सिद्ध श्री मुलतान नगर महाशुभस्थानविषे स्वधर्मी भाई अनेक उपमायोग्य
अध्यात्मरसरोचक भाई श्री खानचंदजी, गंगाधरजी, श्रीपालजी, सिद्धारथदासजी आदि सर्व
स्वधर्मी योग्य. लि० टोडरमलजीना श्री प्रमुख विनय शब्द अवधारजो.
अहीं यथासंभव आनंद छे. तमने चिदानंदघनना अनुभवथी सहजानंदनी वृद्धि चाहुं छुं.
बीजुं, तमारो एक पत्र भाईश्री रामसिंघजी भुवानीदासजीने आव्यो हतो. तेना
समाचार जहानाबादथी अन्य स्वधर्मीओए लख्या हता.
भाईश्री! आवा प्रश्न तमारा जेवा ज लखे. आ वर्तमानकाळमां अध्यात्मरसना रसिक
जीवो बहु ज थोडा छे. धन्य छे तेमने जे स्वानुभवनी वार्ता पण करे छे. ए ज वात कहे
छे केः
तत्प्रति प्रीतिचित्तेन येन वार्तापि हि श्रुता
निश्चितं स भवेद्भव्यो भाविनिर्वाणभाजनम् ।।
पद्मनन्दिपंचविंशतिका (एकत्वाशीतिः २३)
अर्थःजे जीवे प्रसन्नचित्तथी आ चैतन्यस्वरूप आत्मानी वात ज सांभळी छे ते
भव्यपुरुष भविष्यमां थनारी मुक्तिनो निश्चयथी पात्र थाय छे, अर्थात् ते जरूर मोक्षमां
जाय छे.
भाईश्री! तमे जे प्रश्नो लख्या तेना उत्तर मारी बुद्धि अनुसार कंईक लखुं छुं ते
जाणशो. अने अध्यात्म आगमनो चर्चागर्भित पत्र तो शीघ्र शीघ्र आप्या करशो. मेळाप तो
कदी थवो हशे त्यारे थशे, अने निरंतर स्वरूपानुभवनो अभ्यास राखशोजी. श्रीरस्तु.
हवे, स्वानुभवदशा विषे प्रत्यक्षपरोक्षादिक प्रश्नोना उत्तर स्वबुद्धि अनुसार लखुं
छुं
तेमां प्रथम ज स्वानुभवनुं स्वरूप, जाणवा अर्थे लखुं छुंः
जीव [नामनो चेतन] पदार्थ अनादि [काळ]थी मिथ्याद्रष्टि छे; त्यां स्वपरना
यथार्थरूपथी विपरीत श्रद्धाननुं नाम मिथ्यात्व छे. वळी जे काळे कोई जीवने दर्शनमोहना