३४८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
उपशम – क्षय – क्षयोपशमथी स्व – परना यथार्थश्रद्धानरूप तत्त्वार्थश्रद्धान थाय त्यारे ते जीव
सम्यक्त्वी थाय छे. माटे स्व – परना श्रद्धानमां शुद्धात्मश्रद्धानरूप निश्चयसम्यक्त्व गर्भित छे.
वळी जो स्व – परनुं श्रद्धान नथी अने जैनमतमां कहेला देव, गुरु अने धर्म ए त्रणेने
माने छे तथा सात तत्त्वोने माने छे, अन्य मतमां कहेलां देवादि वा तत्त्वादिने मानतो नथी
तो एवा केवळ व्यवहारसम्यक्त्ववडे ते सम्यक्त्वी नामने पामे नहि, माटे स्व – पर
भेदविज्ञानपूर्वक जे तत्त्वार्थश्रद्धान होय ते सम्यक्त्व जाणवुं.
वळी एवा सम्यक्त्वी थतांनी साथे, जे ज्ञान [पूर्वे] पांच इन्द्रिय तथा छठ्ठा मन द्वारा
क्षयोपशमरूप मिथ्यात्वदशामां कुमति, कुश्रुतरूप थई रह्युं हतुं ते ज ज्ञान हवे मति – श्रुतरूप
सम्यग्ज्ञान थयुं. सम्यग्द्रष्टि जे कांई जाणे ते सर्व जाणवुं सम्यग्ज्ञानरूप छे.
ए [सम्यग्द्रष्टि] जो कदाचित् घटपटादि पदार्थोने अयथार्थ पण जाणे तो ते
आवरणजनित औदयिक अज्ञानभाव छे; अने क्षयोपशमरूप प्रगट ज्ञान छे ते तो सर्व
सम्यग्ज्ञान ज छे, केमके जाणवामां पदार्थोने विपरीतरूपे साधतुं नथी, माटे ते सम्यग्ज्ञान
केवळज्ञाननो अंश छे. जेम थोडुंक मेघपटल ( – वादळ) विलय थतां जे कांई प्रकाश प्रगटे छे
ते सर्व प्रकाशनो अंश छे.
जे ज्ञान मति – श्रुतरूप थई प्रवर्ते छे ते ज ज्ञान वधतुं वधतुं केवलज्ञानरूप थाय छे,
तेथी सम्यग्ज्ञाननी अपेक्षाए तो जाति एक छे.
वळी ए सम्यग्द्रष्टिना परिणाम सविकल्प तथा निर्विकल्परूप थई बे प्रकारे प्रवर्ते छे.
त्यां जे परिणाम विषय – कषायादिरूप वा पूजा – दान – शास्त्राभ्यासादिकरूप प्रवर्ते छे ते
सविकल्परूप जाणवा.
प्रश्नः — ज्यां शुभ – अशुभरूप परिणमतो होय त्यां सम्यक्त्वनुं
अस्तित्व केवी रीते होय?
समाधानः — जेम कोई गुमास्तो शेठना कार्यमां प्रवर्ते छे, ते कार्यने पोतानुं कार्य
पण कहे छे, हर्ष – विषादने पण पामे छे, ए कार्यमां प्रवर्ततां ते पोतानी अने शेठनी
आपसमां जुदाई पण विचारतो नथी, परंतु तेने एवुं अंतरंग श्रद्धान छे के ‘आ मारुं काम
नथी.’ ए प्रमाणे कार्य करनार ते गुमास्तो शाहुकार छे; पण ते शेठना धनने चोरी तेने
पोतानुं माने तो ते गुमास्तो चोर ज कहेवाय; तेने कर्मोदयजनित शुभाशुभरूप कार्यनो कर्ता
थई तद्रूप परिणमे, तोपण तेने एवा प्रकारनुं अंतरंग श्रद्धान छे के ‘आ कार्य मारां नथी.’
जो देहाश्रित व्रत – संयमने पण पोतानां माने (अर्थात् पोताने तेनो कर्ता माने) तो ते
मिथ्याद्रष्टि थाय. आवी रीते सविकल्प परिणाम होय छे.