Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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रहस्यपूर्ण चिठ्ठी ][ ३४९
हवे सविकल्पद्वारा ज निर्विकल्प परिणाम थवानुं विधान कहीए छीएः
ते सम्यग्द्रष्टि कदाचित् स्वरूपध्यान करवानो उद्यमी थाय छे त्यां प्रथम स्वपरनुं
भेदविज्ञान (विवेक) करे; नोकर्म, भावकर्मरहित केवळ चैतन्यचमत्कारमात्र पोतानुं स्वरूप जाणे,
पछी परनो विचार पण छूटी जाय, अने केवल स्वात्मविचार ज रहे छे; त्यां निजस्वरूपमां
अनेक प्रकारनी अहंबुद्धि धारे छे, ‘हुं चिदानंद छुं, शुद्ध छुं, सिद्ध छुं,’ इत्यादि विचार थतां
सहज ज आनंदतरंग ऊठे छे, रोमांच (उल्लसित) थाय छे, त्यार पछी एवा विचारो तो छूटी
जाय, केवल चिन्मात्रस्वरूप भासवा लागे; त्यां सर्व परिणाम ते स्वरूप विषे एकाग्र थई प्रवर्ते
छे. दर्शन
ज्ञानादिकना वा नयप्रमाणादिकना विचार (विकल्प) पण विलय थई जाय.
सविकल्प वडे जे चैतन्यस्वरूपनो निश्चय कर्यो हतो तेमां ज व्याप्यव्यापकरूप थई एवो
प्रवर्ते छे के ज्यां ध्याताध्येयपणुं दूर थई जाय. एवी दशानुं नाम निर्विकल्प अनुभव छे. मोटा
नयचक्र ग्रंथमां एम ज कह्युं छेः
तच्चाणेसणकाले समयं बुज्झेहि जुत्तिमग्गेण
णो आराहणसमये पच्चक्खोअणुहवो जह्मा ।।२६६।।
अर्थःतत्त्वना अवलोकन (अन्वेषण) समये अर्थात् शुद्धात्माने युक्ति अर्थात् नय
प्रमाणवडे पहेलां जाणे, पछी आराधन समय जे अनुभवकाळ छे तेमां नयप्रमाण छे नहि,
कारण के प्रत्यक्ष अनुभव छे.
जेम रत्ननी खरीद वखते अनेक विकल्प करे छे पण ज्यारे ते रत्न प्रत्यक्ष पहेरवामां
आवे छे त्यारे विकल्प होतो नथी, पहेरवानुं सुख ज छे. ए प्रमाणे सविकल्प द्वारा निर्विकल्प
अनुभव थाय छे.
वळी जे ज्ञान पांच इन्द्रिय अने छठ्ठा मन द्वारा प्रवर्ततुं हतुं ते ज्ञान सर्व बाजुथी
समेटाई आ निर्विकल्प अनुभवमां केवल स्वरूपसन्मुख थयुं; कारण के ते ज्ञान क्षयोपशमरूप
छे तेथी एक काळमां एक ज्ञेयने ज जाणे छे, ते ज्ञान स्वरूप जाणवाने प्रवर्त्युं त्यारे अन्यने
जाणवानुं सहेज ज बंध थयुं. त्यां एवी दशा थई के बाह्य अनेक शब्दादिक विकार होवा
छतां पण स्वरूपध्यानीने तेनी कांई खबर नथी.
ए प्रमाणे मतिज्ञान पण स्वरूपसन्मुख थयुं.
वळी नयादिकना विचारो मटवाथी श्रुतज्ञान पण स्वरूपसन्मुख थयुं.
एवुं वर्णन समयसारनी टीकाआत्मख्यातिमां छे तथा आत्मअवलोकनादिमां छे,
एटला माटे ज निर्विकल्प अनुभवने अतीन्द्रिय कहीए छीए; कारण के इंद्रियोनो धर्म तो
ए छे के स्पर्श, रस, गंध, वर्णने जाणे, ते अहीं नथी अने मननो धर्म ए छे के ते अनेक
विकल्प करे, ते पण अहीं नथी; तेथी जे ज्ञान इन्द्रियो तथा मनमां प्रवर्ततुं हतुं ते ज ज्ञान
हवे अनुभवमां प्रवर्ते छे, तथापि आ ज्ञानने अतीन्द्रिय कहीए छीए.