३५० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
वळी आ स्वानुभवने मन द्वारा थयो एम पण कहीए छीए केमके आ अनुभवमां
मतिज्ञान – श्रुतज्ञान ज छे. अन्य कोई ज्ञान नथी.
मति – श्रुतज्ञान इन्द्रिय तथा मनना अवलंबन विना होतुं नथी पण अहीं इन्द्रियनो
तो अभाव ज छे, कारण के इन्द्रियनो विषय मूर्तिक पदार्थ ज छे. वळी अहीं मनज्ञान छे,
कारण मननो विषय अमूर्तिक पदार्थ पण छे, तेथी अहीं मन संबंधी परिणाम स्वरूप विषे
एकाग्र थई अन्य चिन्तानो निरोध करे छे तेथी तेने मन द्वारा थयुं एम कहीए छीए.
‘एकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानम्’ (मोक्षशास्त्र अ. ८, सूत्र २७) एवुं ध्याननुं पण लक्षण एवी
अनुभवदशामां संभवे छे.
वळी समयसार – नाटकना कवितमां कह्युं छे केः —
वस्तु विचारत ध्यावतैं, मन पावै विश्राम ।
रस स्वादत सुख ऊपजै, अनुभव याकौ नाम ।।
ए प्रमाणे मन विना जुदा ज परिणाम स्वरूपमां प्रवर्तता नथी, तेथी स्वानुभवने
मनजनित पण कहीए छीए, तेथी तेने अतीन्द्रिय कहेवामां अने मनजनित कहेवामां कांई
विरोध नथी; विवक्षाभेद छे.
वळी तमे लख्युं के ‘आत्मा अतीन्द्रिय छे तेथी अतीन्द्रियवडे ज ग्राह्य थई शके’, तो
भाईश्री! मन अमूर्त्तिक (पदार्थ)ने पण ग्रहण करे छे कारण के मति – श्रुतज्ञाननो विषय सर्व
द्रव्यो कह्यां छे. तत्त्वार्थसूत्रमां कह्युं के —
मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ।।१ – २६।।
वळी तमे प्रत्यक्ष – परोक्षनो प्रश्न लख्यो. पण भाईश्री! सम्यक्त्वमां तो प्रत्यक्ष –
परोक्षना भेद नथी. चोथा गुणस्थाने सिद्ध समान क्षायिकसम्यक्त्व थई जाय छे, तेथी सम्यक्त्व
तो मात्र यथार्थ श्रद्धानरूप ज छे ते (जीव) शुभ – अशुभ कार्य करतो पण रहे छे. (तेथी
कांई यथार्थ पदार्थश्रद्धान न होय एम होतुं नथी;) तेथी तमे जे लख्युं हतुं के ‘निश्चयसम्यक्त्व
प्रत्यक्ष छे अने व्यवहारसम्यक्त्व परोक्ष छे,’ ते एम नथी. सम्यक्त्वना तो त्रण भेद छे.
तेमां उपशमसम्यक्त्व अने क्षायिकसम्यक्त्व तो निर्मळ छे केमके ते मिथ्यात्वना उदय रहित
छे, तथा क्षयोपशमसम्यक्त्व समळ छे, केमके सम्यक्त्वमोहनीयना उदय सहित छे, पण आ
सम्यक्त्वमां प्रत्यक्ष – परोक्षना कोई भेद तो छे नहि.
शुभाशुभरूप प्रवर्तता वा स्वानुभवरूप प्रवर्तता क्षायिक सम्यक्त्वीने सम्यक्त्वगुण तो
समान ज छे, तेथी सम्यक्त्वना तो प्रत्यक्ष – परोक्ष भेद न मानवा.
पण प्रमाणना प्रत्यक्ष – परोक्षरूप बे भेद छे. ए प्रमाण सम्यग्ज्ञान छे, तेथी